Thursday, 26 February 2015

पप्पू गायब हो गया

बधाई हो, कांग्रेस और देश दोनो को कुछ समय के लिए  राहुल गांधी से निजात मिल गई है। कुछ कार्यकर्ताओं को छोड़ कर पूरी पार्टी अंदर ही अंदर खुश है। यह दीगर है की कोई भी बड़ा नेता इस ख़ुशी को ज़ाहिर नहीं कर पा रहा है।

पप्पू भाईसाब के छुट्टी पर जाने से इतना हाहाकार मचा हुआ है की पूछो ही मत। जैसे शक्तिमान गायब हो गया हो और अब संकट यह है की बच्चो को किल्विश के चंगुल से कौन छुड़ाएगा ?
पप्पू यहाँ रहता भी तो भी कौनसा पत्थर को तराश के हीरा बना रहा था बल्कि उसके जाने के बाद तो शेयर मार्किट उछाल मार रहा है। अब जो होना था वो तो हो गया, किन्तु दुनिया के ४ महान लोग ४ महान बातें तो करते ही है उन्हें कोई माई का लाल नहीं रोक सकता। हमने भी अपने सूत्रों को चारो और भेजा और कम से कम ४ लोगो से राहुल के गायब होने के सस्पेंस के बारे में जानने को कहा। और जिन चार लोगो ने ४ बातें बतायी वो बेहद चौकाने वाली थी। लीजिये आप भी पढ़िए।

१. दिग्विजय सिंह के हिसाब से राहुल गांधी के गायब होने के पीछे आरएसएस का हाथ है। थोड़ा और ज्यादा पूछने पर उन्होंने बताया की राहुल गांधी को कुछ दिनों से खाकी चड्डी पहनने का शौक चढ़ा था जो दिग्विजय सिंह ने खुद देखी थी उनके पायजामे के भीतर। (कब, कैसे और  किन परिस्थितियों में ? इन सबका जवाब वो देने से कतरा गए ). हालांकि उन्होंने ज़ोर देकर कहा की राहुल गांधी का ब्रेन वाश करके उसको RSS वालो ने अपने किसी कैंप में छुपा रखा है।

२. RSS के ऊपर लगे इल्जाम को लेकर हम मोहन भागवत के पास पहुंचे। उन्हें हमने बताया की दिग्गिराजा का क्या कहना है। उन्होंने साफ़ कहा की हमें कोई ऐतराज नहीं है अगर पप्पू RSS ज्वाइन करे।भागवत ने दावा की की उसने RSS की जगह ISIS ज्वाइन कर लिया है अब इसमें हम क्या करे। हम तो उसकी तुरंत "घर वापसी" करवा दे बशर्ते दिग्विजय सिंह उम्र भर के लिए मौन व्रत धारण करे फिजिकली और डिजिटली दोनों।

ऐसा होना तो संभव नहीं है की दिग्गी मौन रख के बैठ जाये तो मतलब RSS वाले तो राहुल की घर वापसी न करवा पाएंगे। फिर हमारे सूत्र पहुंचे सोनिया गांधी के पास।

३. राहुल गांधी के गायब होने के पीछे जितना अच्छी तरह से सोनिया गांधी को पता होगा उतना शायद किसी को नहीं। हमारे सूत्रों ने सोनिया जी से भी जानने की कोशिश की तो उन्होंने एक कहानी सुनायी जो उन्ही के शब्दों में प्रस्तुत है: " मैं पिछले साल अपने हाथो से सरकार चले जाने से दुखी थी और रो रही थी, तभी राहुल ने पूछा की क्यों रो रही हो ? मैंने उसे समझाया की जब कोई चीज अपने पास रहती है तब हमें उसकी अहमियत पता नहीं पड़ती, जब वो अपने हाथो से निकल जाती है तो पता पड़ता है की कितनी जरूरी चीज थी। "
सोनिया जी के हिसाब से यही बात राहुल गांधी ने बड़ी सीरियसली ले ली और खुद की अहमियत बताने के लिए वो थोड़े दिनों के लिए सबसे दूर चला गया है। ताकि हमें और पार्टी के लोगो को उसकी अहमियत का अहसास हो।


वैसे राहुल गांधी के पिता कहा करते थे की हमारे राज में जब हम १ रूपया देते है तो वो आप तक पहुँचते पहुँचते १५ पैसे हो जाता है। यह बात राजीव जी ने यूँही नहीं कह दी थी इसके लिए प्रेरणा स्त्रोत उनका अपना बेटा था। घर का कोई भी सदस्य या शिक्षक जब भी राहुल गांधी को कोई बात कहता तो उसका १५% ही राहुल को समझ आता था बाकी सब बेकार जाता था । बचपन से ही राहुल ऐसे है और कांग्रेस ने जनता को शुरू से राहुल ही बनाया है। ऐसा हमारा कहना नहीं है यह बात बताई है उनकी सगी बहन प्रियंका ने जब हमने उनसे राहुल के गायब होने के बारे में पूछा।

४. प्रियंका गांधी ने बताया की राहुल गांधी को एक बार उन्होंने कहा की तू कैजरीवाल से कुछ सिख, आम आदमी की तरह रहा कर तो राहुल ने काउंटर क्वेश्चन किया की कैसे ? कोई उदाहरण दीजिये। तब प्रियंका ने कहा की जैसे तू वेकेशन पर जाता है तो बजट होलिडे लिया कर। सस्ता होता है और आम आदमी की तरह लगता है। बस इसी बात को गंभीरता से लेते हुए राहुल ने बजट के दौरान वेकेशन ले लिया।

इन ४ लोगो की ४ बातों के अलावा हमने सभी ४ लोगो की खबर रखने वाले कुछ पत्रकारों से भी चर्चा की तो उन्होंने जो थ्योरी हमे बताई वो सुन कर तो लगने लगा है की कलयुग का अंतिम चरण शुरू होने को है और जल्द ही प्रलय आने वाला है।

सुनिए पत्रकारों का क्या कहना है : उनके हिसाब से एक थ्योरी तो यह भी है की जिस दिन से राखी सांवत ने AIB रोस्ट वाला अपना बयान दिया की करन जौहर और रणवीर सिंह की आवाज़ डब करके गालियां निकाली गयी है तब से वो और राहुल गांधी एक साथ गायब है।आशंका यह भी जताई जा रही है की दोनो ने भाग के शादी करने का फैसला कर लिया है और इस समय यूगांडा के किसी गांव में वहां के गरीबो की एक बस्ती में अपना हनीमून मना रहे है।

खैर सच्चाई जो भी हो फिलहाल सोनिया गांधी और कांग्रेस के लिए बड़ी राहत की बात है और मीडिया को कुछ और दिनों का मसाला मिल गया है। वहीं कांग्रेस के कुछ युवा कार्यकरता अपने युवा ह्रदय सम्राट के गायब होने का दुःख भी मना रहे है। आपको भी अगर पप्पू की कोई खबर मिले तो जरूर बताईयेगा।



Friday, 20 February 2015

विरोध करो

हमारे देश में ३ विशेष प्रकार के लोग आपको ज़रूर मिलेंगे, एक जो आपकी किसी भी बात पर "हाँजी" की मुंडी हिलाएंगे, दूसरे वो जो आपको हर मोड़ पर, हर कदम पर "राय" देते मिलेंगे और तीसरे वो जो आपकी हर बात का "विरोध" करेंगे। ताज़ा सर्वे के आंकड़े बताते है की तीसरे टाइप के याने की विरोधी स्वाभाव के लोग दिन ब दिन बढ़ते ही जा रहे है।

हर जगह हर कोई किसी न किसी बात का विरोध कर रहा है, विधानसभाओ में विपक्षी दल सत्तारूढ़ दल का विरोध कर रहे है, पत्नियां पतियों का विरोध कर रही है, पप्पू अपनी मम्मी का विरोध कर रहा है , मम्मी मोदी का विरोध कर रही है , सेंसर बोर्ड गालियों का विरोध कर रहा है  और हम अपने सारे विरोध गालियां निकाल के कर रहे है।

अभी अभी वेलेंटाईन डे बीता, हर साल की तरह इस साल भी बहुत दिलजलों ने इसका विरोध किया। शादी से पहले हमने भी गर्लफ्रेंड बनाने की कोशिश की तो हमारे घरवालो ने विरोध किया और शादी के बाद कोशिश की तो घरवाली ने विरोध किया तो तैश में आकर हमने भी इस वेलेंटाईन डे का विरोध कर डाला।

खैर अगर इतिहास खंगाले तो विरोध करना भारतियों के स्वाभाव में था ही नहीं, किन्तु जब से गांधी जी ने अवज्ञा आंदोलन का पाठ पढ़ाया और उस पाठ को हमने इतिहास की किताबो में रटा तब से हमे विरोध करने की आदत सी हो गयी है। यह बात और है की हमारा विरोध कहीं नोटिस नहीं होता न ही उस चीज से बच पाते है जिसका विरोध हम करते है।

मसलन स्कूल न जाने का , सुबह जल्दी न उठने का , होमवर्क न करने का , खेलने न जाने देने का , बर्फ का गोला न खाने देने का और कद्दू, करेले, बैगन, मेथी, पालक, मूंग दाल का विरोध तो आपको याद ही होगा जो बचपन में बहुत किया। टाँगे पटक पटक के किया, मूह फाड़ के, दहाड़े मार के और जमीन पर लेट के किया, किन्तु इतना विरोध करने से आखिर मिला क्या ? कुछ नहीं।

इससे तो अच्छा होता की हमारी माँ ने ही बाबूजी का कुछ विरोध किया होता, तो कम से कम हम इस निर्दयी दुनिया में आने से तो बच जाते।  बचपन में कुचले गए हमारे विरोध की खुन्नस हम उम्रभर किसी न किसी तरह का विरोध करके निकालते रहते है।

आज की दुनिया में तो आलम यह है की अगर सारी दुनिया किसी चीज का विरोध कर रही है और आप कुछ नहीं कर या कह रहे तो आप एक नंबर के चु**ये करार दिए जायेंगे। आजकल अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए आपको किसी अनशन पर थोड़े ही बैठना है न ही पुलिस के डंडे खाने है। सोशल मिडिया का ज़माना है भई और इस ज़माने में विरोध करना कितना आसान है, जिस किसी ने भी विरोधी स्वाभाव की पोस्ट डाली हो  उसपे जाके बस एक "Like" बटन ही तो दबाना है, या किसी की पोस्ट अच्छी न लगे तो उसको थोड़ा गरिया दो याने गालियां पटक दो बस हो गया विरोध और आप बन गए इंटरनेट के "Intellectual" प्राणी। कुछ ज्यादा तूफ़ानी करना हो तो उस पोस्ट की अपने निहायती घने नेटवर्क(फेसबुक, व्हाट्सप्प, ट्विटर) में आग की तरह फैला दीजिये। और ऐसा करके आपने अपने हिस्से की समाज सेवा कर ली मानो।

अब अगर राजनीती की बात करे तो विपक्ष में बैठी पार्टियों का भी तो एक ही काम है , विरोध करो। कुछ भी हो जाये बस सरकार के कामो का विरोध करो। सरकार ने गरीबो के लिए बैंक खाते खुलवाये, विरोध करो, सरकार ने उद्यमियों की सुविधा के लिए कदम उठाये, विरोध करो, बस किसी न किसी तरह विरोध करो। जब कांग्रेस की सरकार ने परिवार नियोजन लागू किया तब लालू विपक्ष में थे उन्होंने इस योजना का विरोध किया, परिणामस्वरूप दर्जन भर बच्चे पैदा कर डाले।  अभी हमारी कांग्रेस पार्टी ने तो आतंकवादियों के इरादो पर पानी फेरने वाले सुरक्षाकर्मियों का ही विरोध कर दिया। अब तो हालत यह है की विपक्षी पार्टियों के अंदर ही एक दूसरे का विरोध शुरू हो गया है।ताजा हाल यह है की बिहार में एक ही दल के २ मुख्यमंत्री एक दूसरे के विरोध में खड़े है।

परन्तु असल बात तो यही है की जिसका जितना ज्यादा विरोध वो चीज उतनी तेज़ी से फैलती है , उदाहरण देखिये। बचपन में होमवर्क का विरोध किया तो वो बढ़ गया, खेल और टीवी पर पाबन्दी का विरोध किया तो १० और चीजो पर पाबन्दी लग गयी। आज की बात करे तो मोदी जी का १० सालो तक भयानक विरोध किया गया, किन्तु फल क्या निकला ?वो उतनी ही प्रचंडता से सरकार में आये। इधर दिल्ली में मोदी ने केजरीवाल का विरोध करने में पूरी ताकत झोंक डाली, और इस विरोध का परिणाम क्या निकला वो तो आप जानते है। आतंकवाद का विरोध पूरी दुनिया सालो से करती आ रही है, किन्तु क्या हुआ? रुकने की बजाये यह तेज़ी से विश्व के हर देश में फैलता जा रहा है। स्वास्थ्य की बात करे तो हम लोग एबोला और स्वाईन फ्लू का कितना विरोध कर रहे है फिर भी रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। और सबसे बड़ा उदहारण फिल्म PK, कितना विरोध हुआ इस फिल्म का, किन्तु सबसे ज्यादा कमाई भी इसी फिल्म ने की।

इतने सरे उदाहरणों से कुछ समझे आप ? मतलब ये है की जिस चीज का जितना तगड़ा विरोध करो वो उतनी ही तेज़ी से फैलती है, सीधे सीधे न्यूटन महाराज का तीसरा नियम लागू हो रहा है।

तो अब ध्यान रखे, जब भी पेट्रोल के दाम घटे तब आप विरोध करे, जब भी अर्थव्यवस्था सुधार की बात हो आप विरोध करे, जब भी सेंसेक्स ऊपर चढ़ता दिखे तुरंत उसका विरोध शुरू करे, सफाई अभियान का विरोध करे, स्वाईन फ्लू और अन्य बीमारी से बचने के लिए जो निर्देश दिए है उनका विरोध करे, यहाँ तक की अगर कोई सरकारी कर्मचारी रिश्वत न ले तो उसका भी विरोध करे, फिर देखिये कैसे हमारा देश तरक्की करता है।

मैंने तो सरकार को चिट्ठी लिख के अपना यह प्रस्ताव भी भेजा है की सरकार अपने ख़ुफ़िया सोशल नेटवर्किंग डिपार्टमेंट को ही यह काम सौंप दे, विरोध करने का, बाकी हम "लाइक और शेयर" के बटन तो दबा ही देंगे।

तो कुल मिलाकर मन की शांति और देश की तरक्की के लिए विरोध करते रहिये। हम पैदा ही विरोध करने और सहने के लिए हुए है।




Wednesday, 11 February 2015

जीन्स V/s फॉर्मल पैंट

उस इंसान(विशेषतः पुरुष प्रजाति) को अपनी कमर की साइज बढ़ने का अहसास जल्दी ही हो जाता है जो नित्य प्रतिदिन फॉर्मल्स कपडे पहन के काम पे जाता है। जीन्स वालो को इतना जल्दी समझ नहीं आता, उन्हें तो तब समझता है जब खड़े खड़े जूते की लेस बांधना पड़ जाये। 

फॉर्मल्स पहनने वाले जब फैलने लगते है तो सबसे ज्यादा बुरा उनके कपड़ो को लगता है। शर्ट तो फिर भी फंसा लेते है शरीर पर किन्तु पैंट सड़ा सा मूँह बना लेती है जब उसको कमर पे चढाने की कोशिश की जाती है। जैसे तैसे पेंट ऊपर खिसकती है तो उसकी बटन रूठ जाती है और लगने से साफ़ मना कर देती है। पेंट को जैसे तैसे फंसा भी लो तो बेल्ट हड़ताल पे बैठ जाता है, बेल्ट की नजर में हम चुलबुल पाण्डे होते है क्योंकि हर महीने उसमे एक नया छेद करते है।


 आजकल के रेडीमेड कपड़ो के ज़माने में पैंट्स ऐसे भी नहीं होते की टेलर को २० रुपये देके कमर बढ़वा लो। ले देके आपके पास २ ही विकल्प होते है, या तो नया खरीदो या फिर कमर को कम कर लो। पहला जेब पर भारी पड़ता है तो दूसरा जेब और शरीर दोनों पर। मैं दोनो ऑप्शंस को दरकिनार कर तीसरे विकल्प के तौर पे जीन्स अपना लेता हूँ। जीन्स का स्वाभाव बिलकुल कट्टरपंथी नहीं है साहब, बहुत ही फ्लेक्सिबल होती है। आप ३२ की लेके आये थे और अब कमर ३४ हो गयी तो भी एडजस्ट हो जाएगी। 

सोमवार की अलसाई सुबह में मेरे फॉर्मल पेंट ने मुझे धुत्कार दिया तो मैंने भी तैश में आकर जीन्स को अपने बदन से लगा लिया। सप्ताह के पहले ही दिन आप सुबह सुबह ऑफिस जीन्स पहन के जाओ वो तब तक ठीक है जब तक की कोई HR बाला या बाल गोपाल आपको रोक के टोक न दे। मेरे नसीब तो गधे की पूँछ के बाल से लिखे हुए है, घुसते से ही सुनने को मिला "एक्सक्यूज़ मी, आप ड्रेस कोड का वोइलेशन कर रहे है" 

 मैंने मन ही मन सोचा की हद्द है यार वहां सीमा पर पड़ौसी देश सीज़फायर का वोइलेशन किये जा रहा है, चुनावो में नेता कोड ऑफ़ कंडक्ट का वोइलेशन कर रहे है, सडको पर हजारो लोग ट्रैफिक रूल्स का वोइलेशन कर रहे है उनको कोई कुछ नहीं कह रहा,यहाँ इस नन्हे से एम्प्लोयी का ड्रेस कोड वोइलेशन तुम्हारी चिंता का विषय बन गया। 

खैर मैंने उस HR सुंदरी से कहा की मैडम, दर-असल जिस हिसाब से हमारी कमर बढ़ रही है न उस हिसाब से आप सैलेरी नहीं बढ़ा रहे हो, अब हर महीने नया फॉर्मल पेंट खरीद के तो नहीं पहन सकते न। मेरी बात सुनकर उसकी आँखों में पानी भर आया और उसने अपनी भीगी पलकें झुकाके मुझे अपनी सीट पे जाने को कहा। 

कुछ ही देर बाद में देखता हूँ की एक ई-मेल आयी हुयी है की इस बार सबको सैलेरी हाईक उनकी कमर की साइज़ के हिसाब से मिलेगा। जिसकी ३६ इंच उसको ३६ टक्का और जिसकी ४० इंच उसको ४० टक्का। मेरे पीछे वाले क्यूबिकल की कुछ ज़ीरो साइज़ लड़कियों को छोड़ के पूरा ऑफिस जश्न के माहौल में डूब चूका था। मैं भी चिल्ला रहा था धन्य है यह कंपनी मैं अब यह कंपनी नहीं छोड़ूंगा, नहीं छोड़ूंगा , कभी नहीं छोड़ूंगा 

 ……………इतने में  बीवी ने एक जग पानी मेरे मुँह पे डाला और चिल्लायी , पहले यह रज़ाई छोडो और उठो, मंडे है आज ऑफिस नहीं जाना क्या ?



इसे कहते है अच्छी खासी "मोटी" सैलरी के "सपने" पे पानी फेरना। 



----------------------चित्र गूगल महाराज की कृपा से सधन्यवाद प्राप्त 

Friday, 6 February 2015

फ़रवरी -रोमांटिक मंथ

फ़रवरी का महीना आमतौर पर बड़ा ही रोमांटिक महीना माना जाता है, आप मानो न मानो लड़कियाँ जरूर मानती है। और ख़ास बात यह है की इसी महीने में ज्यादातर "एडल्ट" और समझदार लोग अपनी समझदारी खोते है और शादी कर लेते है। माना जाता है की मौसम की खुशमिजाजी की वजह से इस महीने को "रोमांटिक मंथ" का ताज मिला है।
पश्चिमी सभ्यताओं की बात करे तो वेलेंटाईन डे भी फ़रवरी  महीने में इसीलिए मनाया जाता है क्योंकि इस समय मौसम बड़ा ही "प्रेमानुकूल" हो जाता है। हमारे देश के महान लॉजिकल लोगो ने तो यहाँ तक कह डाला है की १४ नोवेम्बर को बाल दिवस इसीलिए मनाया जाता है क्योंकि यह वेलेंटाईन डे के ठीक ९ महीने बाद पड़ता है।

आपमें से कईं सारे प्रेम-पंडित तो यह भी जानते होंगे की वेलेंटाईन डे से पहले पूरा वेलेंटाईन वीक मनाया जाता है। पुरे सप्ताह भर के दिवसों के नाम उन तमाम चीजो पर रखे गए है जो केवल लड़कियों को पसंद होती है।
जैसे रोज़ डे, प्रपोज़ डे, चॉकलेट डे, टैडी डे, प्रॉमिस डे, किस डे, हग दे  ओह्ह सॉरी "हग डे" इत्यादि। 

जनाब, अब तक की सारी फ़रवरी रोमांटिक रही होगी, परन्तु यह फ़रवरी तो कतई रोमांटिक नहीं है। २०१५ की फ़रवरी को शायद सबसे अनरोमांटिक महीना भी घोषित किया जा सकता है कुछ फेमिनिस्ट्स समर्थको के द्वारा। मेरा इशारा कुछ कुछ तो आप समझ गए होंगे। नहीं समझे तो सुनिए, लड़कियों को आमतौर पर २ चीजे सबसे ज्यादा इरिटेट करती है एक तो पॉलिटिक्स और दूसरा स्पोर्ट्स । और आजकल के लडको का रुझान स्पोर्ट्स के साथ साथ पॉलिटिक्स में भी बढ़ने लगा है। यहीं होता है "कनफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट"

अब आप समझे की फरवरी का महीना किस कदर अनरोमांटिक हो चला है। दिल्ली में चुनाव हो रहे है और तू-तड़ाक पुरे देश में हो रही है। स्वयं दिल्ली में BJP भर भर के AAP  को गालियां दे रही है तो AAP वाले भी ईंट का जवाब हथगोले से दे रहे है। कांग्रेस वालो को कोई भाव नहीं दे रहा तो वो जो मन में आये वो बके जा रहे है। सोशल मीडिया पर जो जंग चल रही है वहां भी अजय माकन की "विजिबिलिटी" उतनी ही है जितनी दिल्ली के कोहरे में किसी भी चीज की हो सकती है। 

दिल्ली के चुनाव खत्म होते ही क्रिकेट विश्वकप शुरू हो जायेगा, प्रेमी/प्रेमिकाओं के मिलन का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता यहाँ। वेलेंटाईन वीक की शुरुआत दिल्ली चुनावो से होगी और वेलेंटाईन डे आने तक प्री मैच /पोस्ट इलेक्शन एनालिसिस चलता रहेगा। ऐसे में आप सभी प्रेमी बंधुओ को सलाह दी जाती है की अपनी अपनी प्रेमिकाओं के साथ आदर से पेश आये, उन्हें किसी बात से ठेस न पहुचाये और हो सके तो उन्हें मायके / सहेली के घर भेज दे।

वैसे चलते चलते एक बात कहु, दिल्ली के चुनाव पुरे देश में इस कदर से ग़दर मचाये हुए है जैसे एक ही दिन में सलमान और शाहरुख़ की फिल्म रिलीज़ होने को है।  अब देखना यह है की किसकी बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट दिल्ली का भविष्य तय करती है। ओह मैं तुषार कपूर को भूल ही गया वो भी अपनी फिल्म लेके आ रहा है उसी दिन।








Monday, 2 February 2015

टीवी का अत्याचार

आजकल चुनावो का मौसम चल रहा है और पार्टियां अपने अपने वादे-दावे ले ले कर जनता के पास जा रही है। परन्तु ८० प्रतिशत जनता को न फ्री wifi चाहिए, न फ्री पानी-बिजली चाहिए और न ही सस्ता पेट्रोल, उनकी तो एक ही मांग है की कैसे भी करके टीवी चैनल्स पर होने वाले भारी अत्याचार से मुक्ति दिलवा दो। अब यह और बात है की किसी भी पार्टी के नेता ने ऐसी किसी भी मांग को अब तक स्वीकार नहीं किया है। कैसे करे, आखिर नेता भी तो टीवी पर आ आ कर मासूम जनता पर अत्याचार ही कर रहे है।

एक समय था जब मर्द बीवी के अत्याचार से त्रस्त रहता था, परन्तु अब वही मर्द टीवी के अत्याचार से त्रस्त नज़र आता है। आपके घर में अगर एक भी महिला है तो आप ने यह दर्द कभी न कभी तो महसूस किया ही होगा जब आपको मन मार कर, खाना खाते समय,  टीवी पर बालिका-वधु जबरन देखना पड़ा होगा।

सीरियल किलर्स का ज़माना गया और किलर सीरियल्स का ज़माना है भाई लोगो।



अभी अभी तो लोगो ने ओबामा तक से विनती कर डाली की भैया हमारे देश की दूसरी समस्याएं तो जब ख़त्म होगी तब होगी, तुम आतंकवाद, पर्यावरण से निपटते रहना, पहले ससुराल सिमर का से निजात दिलाओ। 
आपकी भावनाओ का तो पता नहीं, परन्तु मुझे कभी कभी जेठालाल पर भी दया आती है जब उसकी "दया" को देखता हूँ, और तो और बेचारी बबिता, मासूम भोली बबीता, उसको तो कोई जेठालाल से बचा लो। तारक मेहता खुद जिनकी लेखनी इन सब की जिम्मेदार है वो भी अब मूह छुपाते घूमते होंगे अपने इलाके में। 

"साथ निभाना साथिया" और "यह रिश्ता क्या कहलाता है" जैसे धारावाहिको में दिखाए जाने वाले बेहद अमीर परिवार भी हमेशा समस्याओं से ग्रसित रहते  है। एक मुसीबत से निकलते ही दूसरी तैयार रहती है, बेचारो का कोई त्यौहार, कोई रस्म, कोई पूजा-पाठ ठीक से नहीं हो पाता, हर घडी कोई न कोई अड़चन आती ही रहती है। अगर हमें इनके अत्याचारों से नहीं बचा सकते तो इन बेचारे परिवारो को कोई तो मुक्ति दिलाओ इन दिनोदिन की बढ़ती मुसीबतो से। 

उधर बिग बॉस में "सलमान के वार " से बचे तो "फरहा खान" के अत्याचार से रूबरू हो गए, कोई तो पार्टी होगी इस चुनाव में जो बिग बॉस पर रोक लगाएगी। एक पार्टी ने तो दिल्ली में लाखो सी. सी.टी. वी कैमरे लगवाने का वादा किया है, मतलब पूरा दिल्ली अब बिग बॉस का घर होगी। समझ नहीं आ रहा ख़ुशी की खबर है या दुःख की। 

आज हमारे देश के युवाओ को ड्रग्स से जितना खतरा नहीं होगा उससे कहीं ज्यादा एम टीवी रोडीज़ से है, जो लगातार ८ वर्षो से एक से एक बेहतरीन चु*** (बीप बीप बीप ) खोज खोज कर दर्शको को परोस रहे है।  

अगर आपको लगता है की आपके दिमाग में ज्ञान का ओवरफ्लो हो चूका है तो आप उपरोक्त उल्लेखित धारावाहिको में से कोई भी एक देख लीजिये। इनसे बेहतर बुद्धिविनाशक और ज्ञान हारक चीज कुछ नहीं है। आप फिर से एक दम तरोताजा होकर ज्ञान की तलाश में निकल जायेंगे। 

 सुनने में तो यहाँ तक आया है की नरक लोक में पापियों को दी जाने वाली यातनाओं में फेर-बदल कर दिया गया है।  अब उन्हें गरम तेल की कढ़ाई में नहीं तला जायेगा, बलकि पाप के हिसाब से प्रतिदिन बिना विश्राम के उन्हें टीवी में यह सारे धारावाहिक एक के बाद एक दिखाए जायेंगे। इस बात से तो साबित हो गया है की आदमी को अपने पापो की सजा इसी जीवन में किसी न किसी चैनल पर भुगतनी पड़ेगी। 

और जब तक यह लेख पूरा होता उससे पहले ही एक खुश खबरी आयी है की अन्ना का अगला आंदोलन अब भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं, टीवी के अत्याचार के खिलाफ होगा। तो भाईयों इसी बात से हम आशा कर सकते है की इस आंदोलन के बाद भी एक और पार्टी बनेगी और उम्मीदों के मुताबिक हमारे लिए टीवी रोकपाल बिल लेकर आएगी। 

तब तक के लिए कोशिश करो की नया चैनल "एपिक" देखने को मिल जाये जो की फिलहाल सारे चुतियापे का एन्टीडोट है । 

नोट : लेख में प्रयोग की गयी मामूली अभद्र भाषा के लिए क्षमा, और अगर दी गयी गाली की तीव्रता कम लगे तो खुद से बढ़ा लीजिये।