Monday, 20 April 2015

बिरियानी

मुझे पता है की कईयों की तो लार टपक पड़ी होगी इस लेख का शीर्षक पढ़ के। हिंदुस्तान में रहो और बिरियानी से प्यार न करो ऐसा कैसे हो सकता है। लखनऊ से लेकर हैदराबाद तक, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक बिरियानी की महक आपको अपनी और खींच लाएगी।

बिरियानी के चर्चे गली मोहल्ले तो छोड़िये आजकल फिल्मो में भी बहुत होने लगे है। वैसे तो बिरियानी मूल रूप से कभी शाकाहारी व्यंजन रहा ही नहीं किन्तु आजकल वेज-बिरियानी भी उतनी ही शिद्दत से बनायी और खायी जाती है जितना की कभी राजा महाराजा मटन बिरियानी खाया करते थे।
दूसरे व्यंजन तो आपको देखने पर ललचायेंगे किन्तु बिरियानी के प्रति आपका प्यार ऐसा है की बिना देखे दूर से ही अगर कही से महक आ जाये तो आपके पेट में हँसी और मुँह में पानी आ जायेगा। वैसे दम बिरियानी का दम निकाल दो तो वो बन जाता है पुलाओ, बिरियानी का ही भाई है। यह भी कहीं कम नहीं पड़ता सैकड़ो प्रकार से बनाया जाता है। पीस पुलाओ, कश्मीरी पुलाओ, बंगाली पुलाओ तो कहीं शाही पुलाओ के नाम से यह भी अपना रंग जमा ही लेता है।

अपने देश का कोई भी प्रदेश हो और किसी भी धर्म, जाती का समारोह हो बिरियानी और पुलाओ हमारी दावतों का अभिन्न अंग है। में खुद ४ साल हैदराबाद में रहा हूँ तो बिरियानी से तो अपना घर जैसा सम्बन्ध हो गया है। यह बात और है की शुद्ध शाकाहारी होने के नाते मेरी प्लेट में आने का सौभाग्य अब तक सिर्फ वेज बिरियानी को ही मिला है। किन्तु कसम संजीव कपूर और मास्टर शेफ की, शाकाहारी बिरियानी में भी जो मजा है न वो शायद हड्डियों वाली में न हो। खैर छोड़िये, बात बिरियानी की हो रही थी, तो उसी पर रहते है , इंसानो की तरह उसका क्लासिफिकेशन नहीं करना चाहिए।

बिरयानी एक ऐसी चीज है जो खुद अपने दम पर जितनी प्रसिद्द हुयी है उससे ज्यादा तो अजमल कसाब ने उसको नाम दिलाया है। दुनियाभर में कसाब की बिरियानी के चर्चे हुए और अगर यह सच है उसे जेल में बिरियानी मिलती थी तो सोचिये की कितनी ताकत है इस बिरियानी में।  एक आतंकवादी के सारे जुर्म कबूल करवा लाई।

आप ऐसा मत सोचियेगा की मैं भूखा नंगा बैठा हूँ और सुबह से खाने को कुछ मिला नहीं इसीलिए फालतू की चीजे लिखे जा रहा हूँ।  दर-असल आज बीवी ने वेजिटेबल दम बिरियानी बनाई थी और जब मैं खाने बैठा तो मसालों की महक से ही आह हा हा , लार टपक सी गयी। फिर जैसे ही पहला निवाला खाया तो पेट को उस अद्भुत आनंद की प्राप्ति हुयी जिसके लिए साधु संत तपस्या करते फिरते है।
किन्तु फिर मेरे दिमाग में आया की बेचारे चावल, सब्जियां और मसाले कितने कष्ट सहते है हमारी तृष्णा शांत करने के लिए। खौलते पानी में इन्हे उबाला जाता है और गरम तेल में तड़का लगाया जाता है उसके बाद परत दर परत एक के ऊपर एक इन्हे बिछा के दम घुटने तक पकाया जाता है। तब जाके तैयार होती है लजीज बिरियानी।

कितनी तपस्या, त्याग और कष्ट झेलती है यह बिरियानी, ऐसा सोचते सोचते मैं जैसे ही दूसरा निवाला उठाने लगा तो एक चावल छिटक के बोला।

"खाले हपशी खाले इतना मत सोच, हम तो बने ही इस लिए है, की हमें पका के तुम खाओ। "

 तभी गोभी का टुकड़ा भी मचल के बोला,

"हाँ हाँ हम इतना सब कुछ तुम्हारे लिए ही तो सहते है। कहाँ कहाँ से हमें लाया जाता है , काटा जाता है पकाया जाता है सिर्फ इसलिए की तुम्हारा पेट भर सके और तुम खुश रहो।"

 फिर दूसरा चावल बोला ,

"तुम इंसान तो एक साथ  एक देश, एक शहर और एक मोहल्ले तो क्या एक घर में शांति से नहीं रह सकते। हमेशा लड़ते झगड़ते हो, कभी जाती के नाम पर तो कभी धरम के नाम पर। कभी अमीरी के नाम पर तो कभी गरीबी के नाम पर। तुम लोग खुद के सिवा दुसरो का भला क्या ही सोचोगे। हमें देखो देश के अलग अलग कोने  से आये और अलग अलग जाती धरम के लोगो द्वारा हमें लाया गया है।हम चावल एक गरीब हिन्दू किसान के खेत से आये है, यह आलू एक दलित के हाथो उखाड़े गए थे और यह जो केसर डाला है न बिरियानी में वो एक मुस्लिम ने उगाया था फिर भी हम एक साथ मिलकर इतनी लजीज बिरियानी बन गए।  हम सब मिलकर, एक साथ एक बर्तन में एक ही आंच पर पक कर तुम जैसे कितने ही इंसानो का पेट और मन भरते है । हमें हर मजहब, जाती और वर्ग का इंसान उतने ही प्यार से खाता है जितने प्यार से हमे उगाया और पकाया गया। "

फिर पूरी की पूरी बिरियानी एक सूर में बोल पड़ी

"तुम इंसानो को भी ईश्वर ने बड़े प्यार से बना के भेजा है एक दूसरे का प्यार पाने के लिए, एक दूसरे की हिम्मत और सहारा बनने के लिए। किन्तु तुम लोग............. छोड़ भाई तू रहने दे यह सब, मत सोच इतना, खाले तू आराम से।"







Monday, 6 April 2015

बीवी और शॉपिंग

यह लेख बीवियों के बारे में लिखा है तो इसका मतलब यह नहीं है की इसको सिर्फ शादीशुदा लोग ही पढ़ेंगे। आप उम्र और रिश्ते के किसी भी दौर से गुजर रहे हो, आपको पढ़ना चाहिए। खुद पे न बीती हो तो कम से कम  दुसरो के जख्मो से रू-ब-रू तो होना चाहिए।

बीवी और शॉपिंग का  रिश्ता बहुत गहरा है। कईं बातें और जुमले कहे गए है इस विषय पर और आगे भी कहे जायेंगे। बीवी को खुश रखने का सबसे सरल परन्तु महंगा उपाय है यह।
वैसे दुनिया के आधे से ज्यादा रईस पुरुष इसलिए खुश नहीं है कि वो रईस है, बल्कि इसलिए खुश है कि उनकी बीवियाँ सदैव शॉपिंग में व्यस्त रहती है और उनके पास फ़ालतू के झगड़ो के लिए समय ही नहीं होता।
हमारे यहाँ मिडिल क्लास पतियों की आफत यह है कि उनकी बीवियों को शॉपिंग का मौका तभी मिलता है जब घर में कुछ तीज-त्यौहार-शादी-ब्याह वगैरह हो। शॉपिंग करके भी उनका जी तब जल जाता है जब उनके जैसी same to same साड़ी या ड्रेस कोई और रिश्तेदार या पड़ौसी भी ले आये और आपके पड़ौसी की यह मासूम सी गलती आपकी जेब पर भारी पड़ती है।
दूसरी आफत इनकी यह है कि अमीरो की तरह सिर्फ कार्ड का भुगतान करके ये अपनी बीवी की शॉपिंग नहीं करवा सकते, इनको तो बीवी के साथ मॉल दर मॉल, दूकान दर दूकान भटकना पड़ता है उसकी पसंद की चीज के ख़ातिर। साड़ी पसंद आ जाये तो फिर मैचिंग की चप्पल के लिए भटको, चप्पल पसंद आयी तो चूड़ियाँ फिर नैल पेंट और न जाने क्या क्या।

इसी प्रकार मेरे एक दोस्त दीपू के साले की शादी के लिए उसको अपनी बीवी को शॉपिंग करवानी पड़ी थी। सारा दिन १४७ दुकानो पर १७६० साड़ियां देखने के बाद दीपू की बीवी को पहली दूकान पर जो दूसरे नंबर पर साडी दिखाई गयी थी वही साडी १४५ वी दूकान पर देखने के बाद पसंद आयी । इस बीच दीपू  ७ घंटो में कुल ८  किलोमीटर पैदल और २२ किलोमीटर गाडी चला चूका था । उसके बाद भी उसको इतनी ऊर्जा बचा के रखने की जरुरत थी कि वो अपनी बीवी को मैचिंग की चप्पल, बैग, ज्वैलरी, चूड़ी और कास्मेटिक भी पसंद करने तक उसके साथ एक मुस्कराहट लिए खड़ा रहे। ( अगर मुस्कान गायब हुयी तो ३ हफ़्ते  बाद भुगतान करना पड़ सकता है। ) 

बीवियों या यूँ कहे कि लड़कियों की यह अजीब बात होती है, इन्हे शॉपिंग की ख़ातिर कितना भी चला लो इन्हे थकान तो क्या माथे पे भी शिकन तक नहीं आएगी।  वहीं पति या आम पुरुष से आप जीम में चाहे जितना मर्जी हम्माली करवा लो आसानी से थकेगा नहीं परन्तु शॉपिंग करने के नाम पे दिमाग में पहले से फिक्स रहता है की किस दूकान से जाके क्या चीज उठा के लानी है और १० मिनट या ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे में शॉपिंग ख़त्म। ज्यादा चलना, घूमना भटकना इनके बस की बात नहीं होती।

तो बात हो रही थी दीपू और उसकी बीवी की शॉपिंग की, सारा दिन बाज़ारो में भटकने के बाद, चप्पल को छोड़ कर बाकी सब मिल गया था। बीवी ने फ़ाइनली कहा थक गए है, घर जाके कौन खाना बनाएगा चलो यहीं से कुछ खाके घर चलते है, चप्पल फिर बाद में फ़ुरसत से देखेंगे।

घर पहुंचे तो दीपू की बैटरी एकदम डाउन हो चुकी थी उसने तुरंत सोने की इच्छा जताई। इसी बात पर बीवी भड़क कर बोली, अभी से क्यों सो रहे हो, जो ड्रेस और साड़ी लाये है वो ट्राय करके दिखाती हूँ। अभी फ़ोन या लैपटॉप लेके बैठोगे तो नींद नहीं आएगी।  दीपू ने भी "बला टालने" के लिए कहा, अच्छा ठीक है जल्दी से दिखाओ। फिर पत्नी जी पुरे साजो सामान के साथ सज-धज के एक एक करके अगले २ घंटे अपनी ड्रेस ट्राय कर कर के दिखाती है। "कैसी लग रही हूँ ?" बेचारा थका मांदा दीपू एनर्जी जुटा के हर बार कहता है "अच्छी है , "यह भी अच्छी है "
 

सिर्फ अच्छी है ?  इतनी मेहनत से मेने पसंद करी, पहन के दिखाई और आप कह रहे हो "अच्छी है " ?रहने दो आपको तो कोई इंटरेस्ट ही नहीं है, वहां बाजार में भी मेरी मदद करवाने के बजाये दूसरी दूसरी  लड़कियों को ही घूर रहे थे आप।जाने दो आपसे मुझे कोई बात नहीं करना।


धम्म से दरवाजा बंद होता है और बीवी एक करवट से पलंग का एक कोना पकड़ के सो जाती है।

और इसी के साथ होता है इति शॉपिंग पुराण।

देखा आपने "शॉपिंग" के नाम से सारे पतियों की हवा टाइट क्यों हो जाती है।





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