Tuesday, 14 June 2016

पहली बारिश



बारिश की पहली बौछार, बिजली की चमकार, मिट्टी की सौंधी महक और पहला -पहला प्यार। अरे अरे आप तो रोमांटिक होने लगे , रुकिए तो सही। श्रृंगार रस  से भरी ये बातें अब जवानी में अच्छी लगती है किन्तु बचपन में तो इन सबके मायने अलग ही हुआ करते थे।

वैसे तो इस पहली बारिश के मायने धरती पर निवास करने वाली हर प्रजाति के हर उम्र, लिंग, और व्यवसाय के हिसाब से अलग अलग हो सकते है। परन्तु मैँ आज संक्षिप्त में बचपन की ही बात करूँगा।

जून का आधा महीना बीत जाने के बाद जैसे ही मौसम सुहाना होने लगता, बादलों का झुण्ड आवारागर्दी करते हुए बरसने को बेचैन होता, बिजलियाँ लूप-झूप करने लगती वैसे ही हमारे दिलो की धड़कने बढ़ने लगतीं थी। यहाँ धड़कनो का ताल्लुक कतई रोमांटिक भावनाओ से नहीं है।  ये पहली बारिश संकेत होती थी गर्मी की छुट्टियां ख़त्म होने का, ये कड़कती बिजलियाँ कहती थी बंद करो ये क्रिकेट और गरजते बादल संदेसा लाते थे की अब स्कूल शुरू होने को है,और इसीलिए तेज़ होती थी धड़कने।



हर इंसान को ईश्वर का वरदान होता है की जो चीज वो टाल नहीं सकता उसके साथ ताल-मेल बैठा ही लेता है। फिर चाहे वो शादी हो, नौकरी हो या स्कूल। इसी प्रकार छुट्टियों का खत्म होना, स्कूल का खुलना और पढ़ाई का शुरू होना वो घटनाएँ थी जिन्हे टाला नहीं जा सकता था। इसलिए इन सब के साथ ताल-मेल बैठाया जाता था इस लालच के साथ की अब सब कुछ नया नया होने को है। नयी क्लास, नयी किताबें, नया बस्ता ( स्कूल बैग) नयी यूनिफार्म और भी कईं चीजे।

तब मिट्टी की खुशबू से ज्यादा अच्छी लगती थी नयी किताबों की महक, जिस प्रकार पहली पहली बूंदे सुखी पड़ी जमीन को भिगोती थी उसी प्रकार नयी-नयी पेंसिल से कोरी कोरी नोटबुक पर नाम लिखा जाता था। 
नाम -> प्रितेश दुबे 
विषय -> हिंदी 
कक्षा ->४ थी 
 जैसे पहली बारिश धरती को धानी चुनर से ढँक देती थी उसी प्रकार हम अपनी किताबो को भूरे कवर से ढंका करते थे। स्कूल खुलने के समय की खरीदी किसी शादी ब्याह की शॉपिंग से कम न होती थी। घर का माहौल स्कूलमय हो जाया करता था। पापा किताबो पर कवर चढ़ाते और माँ यूनिफार्म की फिटिंग सही करती। और हम अपने नए बस्ते को ज़माने में व्यस्त रहते। 
और हाँ WWF के पहलवानो वाले, डिज़्नी के कार्टून वाले और क्रिकेटर्स के फोटो वाले स्टिकर्स का तो बोलना भूल ही गया। 

ऐसा नहीं है की पहली बारिश सिर्फ हमारी धड़कने तेज़ करती थी बल्कि पापा को भी मन ही मन परेशान करती थी। स्कूल खुलने पर हमारा नया बस्ता तो नयी किताबो-कॉपियों से भर जाता था परन्तु शायद उनका बस्ता (बटुआ)खाली हो जाया करता था। जो चीज टाली  नहीं जा सकती उसके साथ ताल-मेल बिठाना भी तो उन्होंने ही सिखाया था तो वो भी इस परिस्थिति से ताल-मेल बैठा ही लेते थे हर बार। 

बारिश तब भी आती थी, बारिश अब भी आती है। स्कूल तब भी खुलते थे, स्कूल अब भी खुलते है। पापाओं की जेब तब भी खाली होती थी और अब भी खाली होती है। सब कुछ वैसा का वैसा है सिवाए बचपन के। बचपन अब वैसा नहीं रहा।



Friday, 6 February 2015

फ़रवरी -रोमांटिक मंथ

फ़रवरी का महीना आमतौर पर बड़ा ही रोमांटिक महीना माना जाता है, आप मानो न मानो लड़कियाँ जरूर मानती है। और ख़ास बात यह है की इसी महीने में ज्यादातर "एडल्ट" और समझदार लोग अपनी समझदारी खोते है और शादी कर लेते है। माना जाता है की मौसम की खुशमिजाजी की वजह से इस महीने को "रोमांटिक मंथ" का ताज मिला है।
पश्चिमी सभ्यताओं की बात करे तो वेलेंटाईन डे भी फ़रवरी  महीने में इसीलिए मनाया जाता है क्योंकि इस समय मौसम बड़ा ही "प्रेमानुकूल" हो जाता है। हमारे देश के महान लॉजिकल लोगो ने तो यहाँ तक कह डाला है की १४ नोवेम्बर को बाल दिवस इसीलिए मनाया जाता है क्योंकि यह वेलेंटाईन डे के ठीक ९ महीने बाद पड़ता है।

आपमें से कईं सारे प्रेम-पंडित तो यह भी जानते होंगे की वेलेंटाईन डे से पहले पूरा वेलेंटाईन वीक मनाया जाता है। पुरे सप्ताह भर के दिवसों के नाम उन तमाम चीजो पर रखे गए है जो केवल लड़कियों को पसंद होती है।
जैसे रोज़ डे, प्रपोज़ डे, चॉकलेट डे, टैडी डे, प्रॉमिस डे, किस डे, हग दे  ओह्ह सॉरी "हग डे" इत्यादि। 

जनाब, अब तक की सारी फ़रवरी रोमांटिक रही होगी, परन्तु यह फ़रवरी तो कतई रोमांटिक नहीं है। २०१५ की फ़रवरी को शायद सबसे अनरोमांटिक महीना भी घोषित किया जा सकता है कुछ फेमिनिस्ट्स समर्थको के द्वारा। मेरा इशारा कुछ कुछ तो आप समझ गए होंगे। नहीं समझे तो सुनिए, लड़कियों को आमतौर पर २ चीजे सबसे ज्यादा इरिटेट करती है एक तो पॉलिटिक्स और दूसरा स्पोर्ट्स । और आजकल के लडको का रुझान स्पोर्ट्स के साथ साथ पॉलिटिक्स में भी बढ़ने लगा है। यहीं होता है "कनफ्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट"

अब आप समझे की फरवरी का महीना किस कदर अनरोमांटिक हो चला है। दिल्ली में चुनाव हो रहे है और तू-तड़ाक पुरे देश में हो रही है। स्वयं दिल्ली में BJP भर भर के AAP  को गालियां दे रही है तो AAP वाले भी ईंट का जवाब हथगोले से दे रहे है। कांग्रेस वालो को कोई भाव नहीं दे रहा तो वो जो मन में आये वो बके जा रहे है। सोशल मीडिया पर जो जंग चल रही है वहां भी अजय माकन की "विजिबिलिटी" उतनी ही है जितनी दिल्ली के कोहरे में किसी भी चीज की हो सकती है। 

दिल्ली के चुनाव खत्म होते ही क्रिकेट विश्वकप शुरू हो जायेगा, प्रेमी/प्रेमिकाओं के मिलन का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता यहाँ। वेलेंटाईन वीक की शुरुआत दिल्ली चुनावो से होगी और वेलेंटाईन डे आने तक प्री मैच /पोस्ट इलेक्शन एनालिसिस चलता रहेगा। ऐसे में आप सभी प्रेमी बंधुओ को सलाह दी जाती है की अपनी अपनी प्रेमिकाओं के साथ आदर से पेश आये, उन्हें किसी बात से ठेस न पहुचाये और हो सके तो उन्हें मायके / सहेली के घर भेज दे।

वैसे चलते चलते एक बात कहु, दिल्ली के चुनाव पुरे देश में इस कदर से ग़दर मचाये हुए है जैसे एक ही दिन में सलमान और शाहरुख़ की फिल्म रिलीज़ होने को है।  अब देखना यह है की किसकी बॉक्स ऑफिस रिपोर्ट दिल्ली का भविष्य तय करती है। ओह मैं तुषार कपूर को भूल ही गया वो भी अपनी फिल्म लेके आ रहा है उसी दिन।