Sunday, 2 April 2017

रोमियो ही क्यों

अभी जोर शोर से जो नाम सुनाई दे रहे है वो है एक तो राम और दूसरा रोमियो। एक ही राशि के दो नामो के प्रति अलग अलग भावनाएं है और हमारे देश में आप किसी की भी जान से खिलवाड़ कर सकते हो परंतु ख़बरदार जो किसी की भावनाओ से खिलवाड़ किया तो।

चलिए ज्यादा सेंटी नहीं होते है और मुद्दे पर आते है की आखिर यार एंटी-रोमियो अभियान एकदम से कैसे चल पड़ा और इसका मास्टर माइंड कौन है ? इस अभियान के मोटिव को तो आप सब जानते ही होंगे, किंतु इसके नामकरण के पिछे हाथ है सुब्रमंड्यम स्वामी का जी सही सुना आपने। दर-असल रोम है इटली में और स्वामी जी को इटली वालो से है नफ़रत। बस इतनी सी बात है की स्वामी जी एंटी रोमियो हो गए और योगी जी को नाम सुझा  दिया।




लेकिन रोमियो से नफ़रत करने वाले स्वामी जी को राम जी से बड़ा प्यार है किन्तु इन्ही राम जी का एक बहुत ही प्रसिद्द भजन है जिससे स्वामी जी को बेहद चिढ है और वो भजन है -
                                                               मेरे रोम रोम में बसने वाले राम.  . .
इसीलिए वो कहते है की राम सिर्फ अयोध्या में बसेंगे रोम में नहीं।


चलिए फिर हम भावनाओ में भटक गए बात करते है मुद्दे की, आखिर एंटी रोमियो या एंटी मजनू ही क्यों ? क्यों कोई सरकार एंटी जूलिएट अभियान नहीं चलाती है उस जूलिएट के लिए जो कॉलेज में अपनी अदा दिखा कर दोस्त बना कर लड़को से कैंटीन का बिल भरवाती है, क्यों उस जुलिएट को कोई कुछ नहीं कहता जिसके लिए बेचारा रोमियो अपनी पढ़ाई छोड़कर उसका सारा असाइनमेंट पूरा करे, उसके लिए डेली हर क्लास अटेंड करे और अंत में सिर्फ एक अच्छा दोस्त (धीरे से इसको चु**या पढ़े )बन के रह जाये।


क्यों कोई अभियान नहीं चलता उस जूलिएट के लिए जो दफ्तरों में हलकी से बातचीत और ठिठोली करके अपना सारा कोड बेचारे रोमियों से लिखवा कर अप्रैज़ल सुधार लेती है  और रोमियो एक बार फिर अप्रैज़ल में C Grade लेकर एक बड़ा C बन जाता है। एक अभियान उस जूलिएट के लिए भी चले जो लिफ्ट खराब होने पर अपना १० किलो का राशन का झोला यह कह के शर्मा जी को पकड़ा देती है की अरे शर्मा जी आप तो बड़े फिट है , क्या मेरा बैग पांचवें माले तक ले चलेंगे ? और शर्मा जी छाती फुलाकर जब पाचंवे माले पर झोला देते है तो यही मैडम थैंक यू भैया कहके छाती पंक्चर कर देती है।

अगर आप हमारी बातो से सहमत है तो इस सन्देश को फैला दो ताकि यह सरकार तक पहुँच  जाये। और हाँ चलते चलते एक और बात कहनी थी कि सुना है अवैध कतलखाने भी बंद हो गए है , फिर भी हुस्न बालाएं अपनी  एक मुस्कान से कितने कितने दिलो का क़त्ल किये जा रही है , जरा इस और भी ध्यान दिया जाये।

चलते है , फिर मिलेंगे। राम और रोमियों से बेख़बर होके जरा रम की एक्सपायरी डेट देख लेते है। 



चित्र गूगल जी की मेहरबानी से
 

Tuesday, 14 June 2016

पहली बारिश



बारिश की पहली बौछार, बिजली की चमकार, मिट्टी की सौंधी महक और पहला -पहला प्यार। अरे अरे आप तो रोमांटिक होने लगे , रुकिए तो सही। श्रृंगार रस  से भरी ये बातें अब जवानी में अच्छी लगती है किन्तु बचपन में तो इन सबके मायने अलग ही हुआ करते थे।

वैसे तो इस पहली बारिश के मायने धरती पर निवास करने वाली हर प्रजाति के हर उम्र, लिंग, और व्यवसाय के हिसाब से अलग अलग हो सकते है। परन्तु मैँ आज संक्षिप्त में बचपन की ही बात करूँगा।

जून का आधा महीना बीत जाने के बाद जैसे ही मौसम सुहाना होने लगता, बादलों का झुण्ड आवारागर्दी करते हुए बरसने को बेचैन होता, बिजलियाँ लूप-झूप करने लगती वैसे ही हमारे दिलो की धड़कने बढ़ने लगतीं थी। यहाँ धड़कनो का ताल्लुक कतई रोमांटिक भावनाओ से नहीं है।  ये पहली बारिश संकेत होती थी गर्मी की छुट्टियां ख़त्म होने का, ये कड़कती बिजलियाँ कहती थी बंद करो ये क्रिकेट और गरजते बादल संदेसा लाते थे की अब स्कूल शुरू होने को है,और इसीलिए तेज़ होती थी धड़कने।



हर इंसान को ईश्वर का वरदान होता है की जो चीज वो टाल नहीं सकता उसके साथ ताल-मेल बैठा ही लेता है। फिर चाहे वो शादी हो, नौकरी हो या स्कूल। इसी प्रकार छुट्टियों का खत्म होना, स्कूल का खुलना और पढ़ाई का शुरू होना वो घटनाएँ थी जिन्हे टाला नहीं जा सकता था। इसलिए इन सब के साथ ताल-मेल बैठाया जाता था इस लालच के साथ की अब सब कुछ नया नया होने को है। नयी क्लास, नयी किताबें, नया बस्ता ( स्कूल बैग) नयी यूनिफार्म और भी कईं चीजे।

तब मिट्टी की खुशबू से ज्यादा अच्छी लगती थी नयी किताबों की महक, जिस प्रकार पहली पहली बूंदे सुखी पड़ी जमीन को भिगोती थी उसी प्रकार नयी-नयी पेंसिल से कोरी कोरी नोटबुक पर नाम लिखा जाता था। 
नाम -> प्रितेश दुबे 
विषय -> हिंदी 
कक्षा ->४ थी 
 जैसे पहली बारिश धरती को धानी चुनर से ढँक देती थी उसी प्रकार हम अपनी किताबो को भूरे कवर से ढंका करते थे। स्कूल खुलने के समय की खरीदी किसी शादी ब्याह की शॉपिंग से कम न होती थी। घर का माहौल स्कूलमय हो जाया करता था। पापा किताबो पर कवर चढ़ाते और माँ यूनिफार्म की फिटिंग सही करती। और हम अपने नए बस्ते को ज़माने में व्यस्त रहते। 
और हाँ WWF के पहलवानो वाले, डिज़्नी के कार्टून वाले और क्रिकेटर्स के फोटो वाले स्टिकर्स का तो बोलना भूल ही गया। 

ऐसा नहीं है की पहली बारिश सिर्फ हमारी धड़कने तेज़ करती थी बल्कि पापा को भी मन ही मन परेशान करती थी। स्कूल खुलने पर हमारा नया बस्ता तो नयी किताबो-कॉपियों से भर जाता था परन्तु शायद उनका बस्ता (बटुआ)खाली हो जाया करता था। जो चीज टाली  नहीं जा सकती उसके साथ ताल-मेल बिठाना भी तो उन्होंने ही सिखाया था तो वो भी इस परिस्थिति से ताल-मेल बैठा ही लेते थे हर बार। 

बारिश तब भी आती थी, बारिश अब भी आती है। स्कूल तब भी खुलते थे, स्कूल अब भी खुलते है। पापाओं की जेब तब भी खाली होती थी और अब भी खाली होती है। सब कुछ वैसा का वैसा है सिवाए बचपन के। बचपन अब वैसा नहीं रहा।



Sunday, 2 August 2015

दोस्तों की ऐतिहासिक जोड़ियां

लैला-मजनूँ , सोहणी-महिवाल, जोधा-अकबर, रोमियो-जूलिएट, राधा-कृष्ण और ऐसी ही बहुत सारी युगल जोड़ियों के नाम सुन सुन के बड़े हुए है हम। हमारे समाज में फिक्शनल लव-स्टोरीज को जितनी मान्यता प्राप्त है उतनी मान्यता रियल लव स्टोरीज को हरगिज़ नहीं मिली। फिर भी कुछ अभागे कोशिश करते है, कुछ सफल प्रेमी कहलाते है कुछ "समाज के सम्मान" की खातिर या तो खुद बलि चढ़ जाते  है या अपने प्रेम की बलि चढ़ा देते है।

जो भी हो, लेकिन आज भी लोग मानते है की प्यार की पहली सीढ़ी  दोस्ती है। प्यार किसी भी प्रकार का हो उसको सफल बनाने के लिए पहले दोस्ती आवश्यक है। कई बार दोस्ती के पैकेट में लपेटकर ही प्यार जताया जाता है और कईं बार सामने वाला वो पैकेट खोल ही नहीं पाता और बात दोस्ती से आगे बढ़ ही नहीं पाती।
खैर,  जब एक युगल जोड़े के बीच पनपे प्यार को फिल्मो में या साहित्य में दर्शाया जाता है तो उसे रोमांस कहते है, वहीं अगर दोस्ती दो  लडको में हो और प्रगाढ़ता से दर्शाया हो तो उसे ब्रोमान्स कहते है।

रोमांटिक जोड़ियों के बारे में तो आपने बहुत पढ़ा, सुना और देखा होगा। आज "फ्रेंडशिप डे(Friendship Day)" स्पेशल में आपको कुछ जानी मानी ऐतिहासिक "ब्रोमांटिक" जोड़ियों के बारे बताते है। और हाँ, ये जोड़ियां जय-वीरू की तरह फिक्शनल नहीं बल्कि सजीव जोड़ियां है।

दोस्ती एक ऐसा रिश्ता माना जाता है जो सबसे अलग हटकर होता है। आपका दोस्त आपका हमराज़ होता है जिसे आप हर छोटी से बड़ी बात, समस्या, उलझन, कठिनाई या ख़ुशी साझा करते है।
तो आईये आज ऐसी ही कुछ ख़ास दोस्तों की जोड़ियों की हम बात करते है।

हमारी लिस्ट की पहली जोड़ी है  
१. कृष्ण-सुदामा की जोड़ी:


यह दोस्ती उदाहरण है इस बात का की दोस्ती में कोई अमीर गरीब नहीं होता, कोई ऊँचा-निचा नहीं होता। सब दोस्त समान होते है। एक जैसे व्यवहार के अधिकारी होते है। कहा जाता है की कृष्ण के राजा बनने के बाद जब सुदामा पहली बार उनसे मिलने द्वारका पहुंचे तो कृष्ण अपनी सभा छोड़कर नंगे पैरो दौड़ते हुए उनको "रिसीव" करने पहुंचे। सुदामा अपने दोस्त कृष्ण के लिए कुछ अनाज लेकर आये थे (As a courtesy gift) किन्तु कृष्ण के राज्य की भव्यता देखकर उन्होंने वो अनाज की पोटली छुपा ली। कृष्ण की नजर जैसे ही उस पोटली पर पड़ी उन्होंने तपाक से उसे सुदामा से छीनते हुए कहा, "क्या छुपाते हो, मेरे लिए भाभी माँ ने कुछ भेजा है, मुझे दो" और पोटली में से अनाज की फाँकियां भर के खाने लगे।
इनकी दोस्ती पर एक अलग पोस्ट लिखी जा सकती है , इतनी प्रगाढ़ दोस्ती थी कृष्ण सुदामा की।

२.  अकबर-बीरबल 

अगर कोई कहे जोधा तो तुरंत अगला नाम आता है अकबर ठीक वैसे ही अगर कोई कहे अकबर तो अगला नाम सीधा आता है बीरबल का। इस जोड़ी पर तो आपको बहुत कुछ देखने सुनने को मिल जायेगा। यही वजह है की जोधा-अकबर के भी पहले से हम अकबर-बीरबल ही सुनते आये है। किन्तु यह जोड़ी कतई फिक्शनल नहीं है। बीरबल, अकबर के नौ रत्नो में से एक थे और अकबर के करीबी होने के कारण उनके सुख दुःख के साथी भी थे। कहने को तो दोनों का रिश्ता प्रोफेशनल था, किन्तु वाकई में दोनो गहरे मित्र भी थे।
बीरबल का असली नाम महेश दास भट्ट था और  महेशदास के  एक संगीतकार, कवि और अच्छे वक्ता होने के कारण अलग अलग राज्यों के दरबार से उनको "ऑफर्स" थे। ऐसे ही स्विच करते करते महेशदास ने अकबर के नौरत्न मंडल को ज्वाइन किया। एक बार एक युद्ध में अपनी युद्धकला से अकबर को जीत दिलाई बस उसके बाद अकबर ने महेशदास को नाम दिया वीरवर जो आगे चलकर बीरबल बन गया।

३. सचिन - कांबली 

आधुनिक काल की महान दोस्तियों की चर्चा हो और इस दोस्ती का नाम न ले ऐसा कैसे हो सकता है। क्रिकेट जगत के आसमान में जगमगाने से पहले सचिन और कांबली लंगोटिया यार हुआ करते थे। साथ में प्रैक्टिस, साथ में स्कूल, साथ में आना जाना और खाना पीना। इन दोनो की दोस्ती प्रगाढ़ तो थी ही किन्तु इनकी प्रोफेशनल जोड़ी भी कमाल की थी। "हेर्रिस शील्ड" ट्रॉफी के दौरान इन दोनों के बनाये गए ६६४ रनों के पहाड़ को आज भी हिमालय की दृष्टि से देखा जाता है। दोनों में वैसे तो कोई दूरी नहीं थी किन्तु प्रोफेशनली दोनों ने अलग अलग रास्ते चुने और थोड़ी दूरियां बढ़ गयी। फिर भी हमारी महान दोस्तों की  जोड़ी की लिस्ट में इनका नाम आने से कोई नहीं रोक सकता।

बात खेल और खिलाड़ी की हो रही हो तो एक और खेल है जहाँ दोस्ती की जोड़ी भी बनती है और दुश्मनी की भी। हम बात कर रहे है टेनिस की। हमारी लिस्ट में अगले महान दोस्त है  . ....... 

४. रोजर फेडरर और स्टेन वावरिंका 

यह दोनों न केवल अच्छे खिलाड़ी है बलकि बहुत ही अच्छे दोस्त भी है। इन दोनो का देश ही समान नहीं है बल्कि इनका कोच और फिटनेस ट्रेनर भी एक ही है। दोनों एक दूसरे का तहे-दिल से सम्मान करते है।
हो सकता है की टेनिस की दुनिया में और भी महान दोस्ती के किस्से रहे हो पर हमारी लिस्ट में स्थान इन दोनों ने पाया है।

अंत में फिर से एक बार ले चलते है आपको इतिहास की ओर और मिलवाते है अगली जोड़ी से जो भी दोस्ती की एक मिसाल है किन्तु सम्मान को प्राप्त न कर सकी।

५. कर्ण और दुर्योधन 

कहते है दोस्ती एक ऐसा रिश्ता है जो पूर्णतः स्वार्थ रहित होता है या होना चाहिए। किन्तु यह दोस्ती अपने -अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए स्थापित हुयी थी और यही कारण है की इस दोस्ती को उस सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता जिस सम्मान का इसे अधिकार है। और यह दोस्ती इस बात की भी मिसाल है की दोस्त को गलत राह पर चलने से न रोक पाना और उसकी हर गलती में साथ देना कितना भारी पड़ता है। कर्ण जो की एक महान योद्धा, एक संवेदनशील इंसान था।  जिसके दिल में गरीबो के लिए प्रेम और दया का भाव था जो की खुद सूर्य पुत्र था किन्तु एक दुर्योधन की दोस्ती ने उसे इतिहास में एक नायक की जगह खलनायक का स्थान दिलवा दिया।
जो भी कह लो किन्तु दोनों ने मित्रता अंत समय तक  निभाई।

तो यह थी ५ मेरी सबसे पसंदीदा दोस्तों को जोड़ी किन्तु इनके अलावा कुछ और नामो का उल्लेख करना चाहूंगा जैसे लेरी पेज-सरजी ब्रिन(गूगल वाले भाई लोग), अमिताभ-अमरसिंग( बिलकुल सचिन कांबली टाइप जोड़ी), सलमान-आमिर(बॉलीवुड स्टाइल जोड़ी), सचिन-गांगुली, और दिग्गी-राहुल गांधी।
 

तो बताईये आपको कौनसी जोड़ी सबसे ज्यादा अच्छी लगी या कोई और भी जोड़ी हो जो आपकी आदर्श हो और इस लिस्ट में न हो तो कमेंट करके बताईये।



बार बार कहने की जरुरत तो नहीं पर फिर भी कहना चाहिए की सारे चित्र गूगल इमेज सर्च के सौजन्य से




Monday, 9 March 2015

परीक्षा की तैयारी


मार्च का महीना, फागुन की बयार, क्रिकेट का सीजन और पहला पहला प्यार लेकिन इन सब पर बैरन परीक्षा की मार।

अगर आप यह लेख पढ़ पा रहे है(मतलब अगर आप पढ़े-लिखे है) तो उपरोक्त पंक्ति को आप अच्छे से समझ पा रहे होंगे(मतलब कभी कोई परीक्षा दी ही होगी)। परीक्षाओ का मौसम चल रहा है। २०-२० क्रिकेट भी चालु है और अभी अभी बसंत बीता और फागुन आया है।  परीक्षा जैसी मनहूस चीज के लिए ऐसा समय जिसने भी चुना वो बड़ा ही नीरस किसम का इंसान रहा होगा। खैर छोड़िये, बात करते है परीक्षा की तैयारियों की। विशेषकर हमारे जमाने(90s) की तैयारियों की। जैसे जैसे परीक्षा नज़दीक आती थी, वैसे वैसे दिलो-दिमाग की हालत उस दूल्हे जैसे होने लगती थी जो आज ही ब्याहने जा रहा हो।  परीक्षा के बाद मिलने वाली गर्मी की छुट्टियों की खुशियां तो मन में रहती ही थी साथ ही बालको को फ़ैल होने का और कन्यायों  को १००/१०० न ला पाने का डर भी रहता था।

परीक्षा शुरू होने से कुछ ही दिनों पहले जैसे ही प्रिपरेशन लीव पड़ती थी  हम बनाते थे  एक "टाइम-टेबल ", चिपकाते थे उसे वहां जहाँ हमारी नजर बार बार पड़े। और ये टाइम-टेबल कुछ इस तरह से होता था :

सुबह ५ बजे उठना और थोड़ी सी खिट -पिट करके जता देना की हाँ उठ गए है।  ५ से ७ पढ़ना या लाइट जाने का इन्तेजार करना, जैसे ही लाइट जाये तुरंत सो जाना। ८-९ बजे उठकर घरवालो को बताना की कैसे आज ४ बजे से ७ बजे तक पढ़ाई करी। फिर नहाना -धोना(अगर मूड हुआ तो), खाना पीना और दोस्त के घर पढने जाना और वहां जाकर क्या पढ़ना यह आपको अच्छे से पता है। दोस्त के घर से सीधे ट्यूशन जाना। ट्यूशन पर थोड़ा पहले पहुँचना और "उसका" इन्तेजार करना।वो आ जाये तो क्लास ख़त्म होते ही उससे बात करने की फिर एक आखिरी नाकाम कोशिश करना।

स्कूल में हो न हो ट्यूशन में हमारी अटेंडेंस शत प्रतिशत रहती है। हर रोज इसी आस में जाते है कि आज तो बात कर लूंगा, हालांकि अक्सर ऐसा करते करते साल गुजर जाता है और बात वहीं रह जाती है।  घर आके मूड फ्रेश करने का कह के थोड़ा खेलना उसके बाद जहां सुबह किताब बंद हुयी थी वहीं से आगे बढ़ने की "कोशिश" करना। कईं बार किताब का एक पन्ना एक तनहा जिंदगी जैसा लगता है, जो आसानी से गुजरती नहीं। खैर थोड़ा पढ़ के खाना खाके फिर मूड फ्रेश करना पड़ता है टीवी देख कर। अब चूँकि सुबह जल्दी उठना है तो जल्दी सोना पड़ेगा।

यही सब करते करते आ जाती है मुई परीक्षा। घर वाले, रिश्तेदार, आस-पड़ोस सभी एक ही सवाल पूछते है , "हो गयी तैयारी परीक्षा की ?" हम भी जोर शोर से कहते है हाँ हाँ एक दम फर्स्टक्लास तैयारी हो गयी।
और हमारी तैयारी होती थी कुछ इस तरह :

यूनिफार्म पर इस्तरी कर ली जूते पोलिश कर लिए और साइकिल की एक मरम्मत करवा ली। नया रेनॉल्ड्स 045 फाइन कर्बर या रोटोमैक (लिखते लिखते लव हो जाये वाला) या सेलो जैल पेन और उसकी २ एक्स्ट्रा रिफिल खरीद ली। नया शार्पनर और रबर खरीदा। नयी नटराज या अप्सरा( औकात के हिसाब से लगा लो ) पेन्सिल शार्प करके रखी। एक कम्पास बॉक्स* लिया जिसमे नया स्केल*, चांदा*, डे-टांगा* पहले से आया था।

एक नया क्लिप वाला पुष्टां* खरीदा। पुष्ठे पर परीक्षा का टाईमटेबल चिपकाया। कम्पास बॉक्स में सारी आयटम अच्छे से चेक करके रखी और प्रवेश पत्र भी उसी में ठूस लिया। २-३ बार इन सब चीजो को बारी बारी से चेक किया और हो गयी हमारी परीक्षा की तैयारी।आजकल के बच्चे तो खामखाँ का टेंशन लेते है।


*

ग्लोसरी:
क्लिप वाला पुष्टां= clipboard
चांदा = Protractor,
डे-टांगिया= Divider or Compass,
कम्पास बॉक्स= Geometry box,
स्केल= Ruler


और हाँ ....... चित्र इंटरनेट के सौजन्य से।


Thursday, 15 January 2015

जिंदगी के मासूम सवाल

सवाल जवाबो में उलझी इस जिंदगी में हम निरंतर जवाब देते हुए आगे बढ़ते रहते है। जिंदगी भी कभी चुप नहीं बैठती सवाल पे सवाल दागती ही रहती है। तभी तो परेशान होकर  गुलज़ार साहब ने लिखा "तुझसे नाराज नहीं जिंदगी, हैरान हूँ मैं, तेरे मासूम सवालो से परेशान हूँ मैं "

हमने जिंदगी के ऐसे ही कुछ "मासूम" से सवालो की एक सूचि संकलित की है जिनसे आपका पाला अवश्य ही पड़ा होगा। यह वो सवाल है जिनसे अरनब गोस्वामी भी एक बार तो परेशान हुआ ही होगा।




विद्यालय में पहली कक्षा से लेकर १२ वी कक्षा तक जो सवाल आपको बहुत तंग करते है उनमे से सबसे ऊपर है
 रिजल्ट कैसा रहा ? यह सवाल परीक्षा में पूछे गए सवालो से भी ज्यादा परेशान करता है। 
फिर 
क्या विषय ले रहे हो १०वी के बाद ? इस सवाल के जवाब में हम और हमारे घरवाले कभी एक मत नहीं होते। 

फिर जैसे तैसे १२वी हो जाये तो

कौन से कॉलेज में एडमिशन ले रहे हो ? (अगर कोई ढंग का कॉलेज मिल जाये तो ठीक नहीं तो अगले ३-४ साल भुगतो इस सवाल और इसके जवाब को )

फिर रिजल्ट कैसा रहा ? ( हर सेमेस्टर/साल, घूम के फिर यही सवाल आ ही जाता है )
अब कॉलेज जाना शुरू हो गया, और गलती से थोड़ा बन-ठन के निकले तो जो सवाल तैयार रहता है वो है 
किसी के साथ कोई चक्कर तो नहीं चल रहा ? ( यह सवाल डायरेक्ट नहीं पूछा जायेगा, घुमा फिरा के पूछेंगे)

कॉलेज खत्म होते होते अगला भयानक प्रश्न तैयार हो जाता है 
प्लेसमेंट हुआ ? कहाँ हुआ ? ( घरवालो से ज्यादा पड़ौसी चिंतित रहते है, जैसे उनके घर राशन नहीं आएगा अगर मेरा प्लेसमेंट नहीं हुआ तो )
हो गया तो नेक्स्ट क्वेश्चन 
कितना पैकेज है ? ( "बस इतना हमारे साढू के भतीजे का तो इतना है", अरे कितना भी हो कौनसा तुम्हारे अकाउंट में जाने है  )

फिर जैसे तैसे नौकरी मिल भी गयी तो हमारे ही अन्य दोस्त जो हमारी ही कंपनी में या अन्य कंपनी में काम कर रहे होते है, पूरा साल एक ही सवाल करेंगे,
अप्रैज़ल हुआ ? कितना हाईक मिला ?

और गलती से आप आय. टी. में हो तो तैयार रहो की साल में १२ बार यह सवाल भी आपको तंग करेगा की "फॉरेन-वॉरेन गए की नहीं एक बार भी "

फिर जिंदगी का सबसे ज्यादा दोहराने वाला और सबसे ज्यादा चिढ दिलाने वाला प्रश्न जो आपके जीवन से जुड़ा हर व्यक्ति आपसे पूछेगा
शादी कब कर रहे हो ?
शादी कब कर रहे हो ?
शादी कब कर रहे हो ? ( हर बार, हर कोई पूछेगा, जब तक की हो नहीं जाती,  इस सवाल पर तो पूरी किताब लिखी जा सकती है )

झल्ला के ही सही आप शादी कर लेते है और उसके तुरंत बाद, अगला यक्ष प्रश्न हाजिर हो जाता है
खुशखबरी कब दे रहे हो ? ( पहले साल )
खुशखबरी कब दे रहे हो ? ( दूसरे साल )
इस साल तो हो ही रहे हो न दो से तीन ( हर साल, जब तक की तीसरा आ नहीं जाता ) 
और जहाँ हमें एक खुशखबरी देने में १० बार सोचना पड़ता है वही हमारे नेता ४-४, ५-५ खुशखबरी देने को बाध्य कर रहे है। 

और खुशखबरी देने के २-३ साल बाद 
कौनसे स्कूल में डाल रहे हो ? (और गलती से आप पूछ लो की आप ही बताईये, तो तैयार रहिये रायचंदो से निपटने के लिए)

यह तो वो प्रश्न थे जो की दोस्त, रिश्तेदार, पड़ौसी, माँ-बाप, और भाई बहन आपसे पूछते रहते है। इनके तो आप जवाब भी दे सकते हो, तुरंत न सही थोड़ा वक्त लेकर। किन्तु कुछ सवाल ऐसे है जिनका जवाब आजतक नहीं खोजा जा सका है, और कोई जवाब देता भी है तो सीधे सीधे नहीं दे सकता। पहले तो सवाल ही कठीन और दूसरा यह सवाल पूछे जाते है आपकी धर्मपत्नी के द्वारा। याने की करेला वो भी नीम चढ़ा। 

तो दोस्तों पेश के जिंदगी के सबसे बड़े और खतरनाक २ सवाल जिन्होंने लगभग हर इंसान को एक बार तो परेशान किया ही होगा।

१. जानू, मैं सच में मोटी लगती हूँ ? ( सच कहो या झूठ या डिप्लोमेटिक हो जाओ, मेरे ख्याल से चुप रहना ज्यादा बेहतर है। )

और

२. आज खाने में क्या बनाना है ?(बाकी के सवाल तो कभी न कभी पीछा छोड़ ही देते है, परन्तु इस सवाल का हमारे जीवन से वैसा ही नाता है जैसा केजरीवाल का टीवी से, कांग्रेस का घोटालो से और मोदी का माइक से)



ऐसे ही आपके कोई पर्सनल सवाल हो जो इस सूचि में न हो और आपको लगता है की वो भी जीवन के सबसे जटिल प्रश्नो में से एक है तो कमेंट करिये। 

Thursday, 20 November 2014

अजनबी हवा

यह कविता मेने आज से करीब ६- ७ साल पहले तब लिखी थी जब हम लोग कॉलेज से पास आउट होकर अपनी अपनी नौकरियों की तलाश में या जॉइनिंग के लिए निकल रहे थे, जब बीता हुआ कॉलेज का हर लम्हा आँखों के सामने फ़्लैश बैक की तरह घूम रहा था। हम सभी ने कॉलेज में एडमिशन इसी दिन के लिए तो  लिया था की एक दिन अच्छी कंपनी में नौकरी करने जायेंगे, पर जॉब मिलने की ख़ुशी से ज्यादा इस बात का अफ़सोस था की कॉलेज में बने दोस्त बिछड़ जायेंगे, अलग अलग शहरों और कंपनियों में चले जायेंगे।  और वैसे भी किसी महान शख्स ने कहा है की दोस्त कॉलेज लाइफ तक ही मिलते  है उसके बाद जो मिलते है वो तो सिर्फ कलीग्स होते है।

आईये एक "एमेच्योर कवि" की हिंदी -उर्दू  मिश्रित कविता की चंद पंक्तियों का आनंद लीजिये, और अच्छी लगे या बुरी , कमेंट करके बताईये।


कदमो को जुदा जुदा सी लगे यह जमीं। 
इन सांसो को हवाएँ भी लगने लगी अजनबी। 

सर पर है जो आसमाँ वो भी लगता अब अपना नहीं। 
लम्हा लम्हा गुजरता यह वक़्त क्यों थमता नहीं। 

इन अजनबी हवाओं के साथ बाह चले है सभी। 
कुछ ख्वाब पुरे हुए, कईं और  ख्वाब बाकी है अभी। 

राहें बदल जाएंगी, ख्वाब बदल जायेंगे। 
पर इन ख्वाबो को पनाह देंगी ऑंखें वही। 

हमने न सोचा था की ये पल इतनी जल्दी आएंगे। 
हँसते खेलते ये  साल यूँही बीत जायेंगे। 

जिस डोर से जिंदगी को नचाया था हमने कभी। 
उसी डोर पर कठपुतलियों की तरह नाचेंगे हम सभी। 

जंदगी नए मोड़ पर खड़ी है अपनी हकीक़त का आईना लेकर। 
और एक हम है जो इस वक़्त को थाम रहे है हाथो से पकड़ कर। 

यह वक़्त अब नहीं थम पायेगा, पहिये की तरह घूमता जायेगा। 
इन चंद सालो का हर एक लम्हा यादों के सुनहरे पिंजरे में कैद हो जायेगा। 

कॉलेज से भले ही हम हो रहे है विदा। 
पर खुद को कभी न समझना दोस्तों से जुदा। 

हम फिर मिल जायेंगे, वही हंगामा फिर मचाएंगे। 
मिल कर फिर इस जिंदगी को उसी की डोर से नचाएंगे। 

-प्रितेश दुबे