Friday, 2 June 2017

सुखी और सफल वैवाहिक जीवन के आधुनिक नुस्ख़े -1

सुखी और सफल वैवाहिक जीवन के आधुनिक नुस्ख़े

 अरे आप हंस क्यों रहे हो ? चुटकुला नहीं है। ऐसा होता है। वैसे सफल वैवाहिक जीवन होना अलग बात है, सुखी वैवाहिक जीवन होना दूसरी बात है और एक सुखी प्लस सफल का कॉम्बो वैवाहिक जीवन सबसे बड़ी बात है जो शायद आपको फिक्शनल सी लगे। लेकिन यकीन मानो सुखी, सफ़ल और ऊपर से वैवाहिक, ऐसा जीवन होता है इसी धरती पर होता है। झूट बोलू तो काला कुत्ता काटे (कुत्ता इसलिए क्योंकि काले कौवे आजकल हमारी लोकैलिटी में नहीं मिलते, वो पुराने लोग कहते है न कि  कौवा बोले तो अतिथि आ जाते है, इसीलिए अतिथियों के भय से हमने कौवो को मार भगाया, और अपने अपने घरो में कुत्ते पाल लिए है। )

 मुद्दे पर आते है, तो जनाब जिनका कट चूका है मतलब विवाह हो चूका है वो लोग ध्यान और मन लगा के पढ़िए और वो जिनकी बुद्धि अब तक सही सलामत है वो तो अवश्य पढ़े। अविवाहित इंसान सदैव ऐसा नहीं रहने वाला, क्योंकि किसी ने कहा है कि भारत में मनुष्य एक ऐसा प्राणी है जो विकासशील हो न हो विवाहशील जरूर है । आप कितने ही अच्छे तैराक क्यों न हो विवाह रूपी दरिया में आपने डूब ही जाना है एक दिन।

पुरातन काल में तो हमारे पूर्वजो ने जैसे तैसे अपने जीवन को सुखी और सफल बना लिया था किन्तु मॉडर्न युग में आपको अगर एक सुखी और सफल वैवाहिक जीवन जीने की कला सीखनी है तो अपने आसपास गौर से देखना शुरू कीजिये।

हमने भी अपने आसपास की चीजों का थोड़ा अध्ययन किया और गूढ़ रहस्य का पता पड़ा की सोशल मीडिया वाले आधुनिक काल में स्वयं के चुने हुए शत्रु के साथ कैसे जीवन बिताया जाये। जी हाँ दोस्तों, मैंने  हाल ही में जाना कि सोशल मिडिया के जरिये आप सिर्फ सरकार ही नहीं चला सकते अपितु घर गृहस्थी और परिवार भी चला सकते है।

कैसे ?

निम्नलिखित बिंदुओं को पढ़े और आत्मसात करे। आज सोशल मीडिया का जमाना है उसका भरपूर उपयोग ही आपको बैकुंठ धाम का सुख देगा।

१. बीवी को कभी भी फेस-टू -फेस हैप्पी बर्थडे न बोले, बल्कि फेसबुक पर एक घटिया से शायर की चुराई हुयी तुकबंदी के साथ जन्मदिन की शुभकामनायें दें। (इसके लिए मुझे संपर्क करे, हाथोहाथ तुकबंदी करके देंगे वाज़िब दाम पर) अपनी फेसबुक पोस्ट में बताएं दुनिया को की आप कितने खुशनसीब है जो आपको ऐसी (ऐसी मतलब, वो जैसी है वैसे नहीं लिखना है उसका उलट बहुत तारीफों के साथ लिखना है ) बीवी मिली है। खबरदार जो अगर आपने यहाँ सच का एक बूँद भी लिखा, तो बे-मौत मारे जाओगे। (इसकी जिम्मेदारी हम नहीं लेंगे)

२. जन्मदिन पर आप उसके कुछ पुराने अच्छे से (फ़िल्टर और मेकअप वाले ) फोटोज़ भी पोस्ट कर सकते है। यहाँ भी  यह ध्यान रहे की कोई ऐसा फोटो गलती से भी न पोस्ट हो जाये जिसमे फ़िल्टर न लगा हो या बिना मेकअप वाला फोटो हो।अगर आपसे ऐसा कुछ हो जाता है तो एम्बुलेंस को एडवांस में फ़ोन करके रखिये।


३. अच्छा, आपको उसके अच्छे फोटोज नहीं मिल रहे है तो बढ़िया मौका है रिश्ते को मजबूत करने का, तुरंत एक DSLR खरीद डालिये, ऑटो मोड में बीवी के धड़ाधड़ फोटोज निकालिये। जहाँ भी आप जाइये कैमरा लेकर जाइये। और इन फोटोज को अच्छे से डबल प्रोसेस करके बीवी को कहिये अपलोड करे। फिर आप अपने आप को टैग करे और फोटोज पर होने वाली लाइक्स का हाफ सेंचुरी, सेंचुरी, डबल सेंटरी इत्यादि सेलिब्रेट जरूर करे।

४ . बीवी के द्वारा शेयर की हुयी हर पोस्ट को Like करे खासकर वो वाली पोस्ट्स जिसमे वो बता रही है की पिछले जनम में भी उसके पति आप थे, या उसके लिए सबसे अच्छा शहर पेरिस है, या उसकी शकल किसी सेलिब्रिटी से मिलती है या वो इस दुनिया में क्यों आयी है । इन सब पोस्ट्स को बराबर like करिये। क्योंकि इनमे वो आपको already टैग तो कर ही चुकी है ।

५ . जब भी कोई फ़िल्म देखने जाओ या किसी मॉल में तफरी ही करने जाओ तो फेसबुक पर चेक-इन करना न भूलें , और हाँ उस चेक-इन में अपनी बीवी को टैग करना तो कतई न भूलें। बता रहा हूँ ये सबसे लोकप्रिय नुस्खा है सामंजस्य बैठाने का।


६ . आप भले ही ५ स्टार होटल या किसी लक्ज़री रेस्टारेंट के बाजू में खड़े होकर पानीपुरी खा रहे हो लकिन फेसबुक पर चेक इन होटल या रेस्टॉरेंट का ही करे।

७ . बजट निकाल के हर साल विदेश नहीं तो कम से कम मनाली, नार्थ-ईस्ट इत्यादि जगहों पर जाकर ढेरो फोटो खिचवा के आये। ज्यादा कहीं नहीं तो महाबलेश्वर या गोवा ही चले जाये। फिर उन फोटोज को साल भर एक एक करके चिपकाते रहिये with the tagline "Golden memories" . ये बहुत प्रभावित करने वाला नुस्खा है।
(लोगो को नहीं अपनी घरवाली को प्रभावित करने वाला नुस्खा )

अरे अरे रुकिए अभी आपके दिमाग में सवाल आया होगा बीवी को हर जगह टैग करके वो खुश कैसे होगी ? तो जनाब  ऐसा है कि बीवी को जब आप ऐसी सुहानी, रोमांटिक और महँगी घटनाओ पर टैग करते हो तो वो वो मैसेज जाता है बीवी की सहेलियों को। और यही तो आपकी बीवी चाहती है।
और वो इतना ही नहीं चाहती, वो यह भी चाहती है की उसके साथ आपकी मुस्कुराती हुयी फोटो लगाने से आपकी भी सखियों तक मैसेज पहुंचे कि आप अपनी बीवी के साथ कितने खुश है।

८  .अगली बात , अपने ज़ेहन में २ तारीखें परमानेंट मार्कर से गोद के रखे एक तो बीवी का जन्मदिन और दूसरा खुद का बलिदान दिवस (शादी की सालगिरह) . जैसे ही सालगिरह आये वैसे ही फिर वही, एक अच्छा सा दार्शनिक सा पोस्ट डाले और अपनी अर्धांगिनी को सालगिरह विश करें। ( फेसबुक पर ही )

 
९  . जब भी आप कुछ महंगा सामान खरीदें खुद के पैसो से खुद के लिए, तो उसको ख़ुशी ख़ुशी इस्तेमाल करने के लिए पहले फेसबुक पर डिक्लेअर करे की यह खूबसूरत तोहफा आपको आपकी beloved wife ने दिया है और आप उसके शुक्रगुजार है। उसको फेसबुक पर ही थैंक यू भी कहें। यह बात हर चीज पर लागू होती है, जी हाँ आप कच्छे बनियान तौलिये को भी गिफ्ट डिक्लेअर कर सकते है।

१०  .  अंतिम बात ,आप अगर राजनीती, खेलकूद, वैश्विक समस्याएं, सामाजिक कुरीतियों या टेक्नोलॉजी से जुडी कोई पोस्ट कर रहे है तो गलती से भी उसमे अपनी बीवी को टैग न करे।  ये सारी बातें एलर्जिक हो सकती है और आप को इसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते है। लेकिन अगर आप बॉलीवुड या टीवी जगत से जुडी कुछ बात शेयर कर रहे है तो पक्का टैग करे।

और हाँ सबसे बड़ी बात, ये नुस्खे वाली बात अपनी बीवी को कतई न बताये, मेरा नाम लेकर तो बिलकुल नहीं। प्लीज हाथ जोड़कर विनती है।

अभी के लिए इन १० बातो पर अमल करिये, तब तक मैं कुछ और नुस्खे खोज के लाता हूँ।

मजा आये या न आये मेरी इस पोस्ट को लाइक जरूर करना सिर्फ यह जताने के लिए की आप एक भले मानस है। नहीं किया तो काला कुत्ता पीछे पड़ जाये

Sunday, 2 April 2017

रोमियो ही क्यों

अभी जोर शोर से जो नाम सुनाई दे रहे है वो है एक तो राम और दूसरा रोमियो। एक ही राशि के दो नामो के प्रति अलग अलग भावनाएं है और हमारे देश में आप किसी की भी जान से खिलवाड़ कर सकते हो परंतु ख़बरदार जो किसी की भावनाओ से खिलवाड़ किया तो।

चलिए ज्यादा सेंटी नहीं होते है और मुद्दे पर आते है की आखिर यार एंटी-रोमियो अभियान एकदम से कैसे चल पड़ा और इसका मास्टर माइंड कौन है ? इस अभियान के मोटिव को तो आप सब जानते ही होंगे, किंतु इसके नामकरण के पिछे हाथ है सुब्रमंड्यम स्वामी का जी सही सुना आपने। दर-असल रोम है इटली में और स्वामी जी को इटली वालो से है नफ़रत। बस इतनी सी बात है की स्वामी जी एंटी रोमियो हो गए और योगी जी को नाम सुझा  दिया।




लेकिन रोमियो से नफ़रत करने वाले स्वामी जी को राम जी से बड़ा प्यार है किन्तु इन्ही राम जी का एक बहुत ही प्रसिद्द भजन है जिससे स्वामी जी को बेहद चिढ है और वो भजन है -
                                                               मेरे रोम रोम में बसने वाले राम.  . .
इसीलिए वो कहते है की राम सिर्फ अयोध्या में बसेंगे रोम में नहीं।


चलिए फिर हम भावनाओ में भटक गए बात करते है मुद्दे की, आखिर एंटी रोमियो या एंटी मजनू ही क्यों ? क्यों कोई सरकार एंटी जूलिएट अभियान नहीं चलाती है उस जूलिएट के लिए जो कॉलेज में अपनी अदा दिखा कर दोस्त बना कर लड़को से कैंटीन का बिल भरवाती है, क्यों उस जुलिएट को कोई कुछ नहीं कहता जिसके लिए बेचारा रोमियो अपनी पढ़ाई छोड़कर उसका सारा असाइनमेंट पूरा करे, उसके लिए डेली हर क्लास अटेंड करे और अंत में सिर्फ एक अच्छा दोस्त (धीरे से इसको चु**या पढ़े )बन के रह जाये।


क्यों कोई अभियान नहीं चलता उस जूलिएट के लिए जो दफ्तरों में हलकी से बातचीत और ठिठोली करके अपना सारा कोड बेचारे रोमियों से लिखवा कर अप्रैज़ल सुधार लेती है  और रोमियो एक बार फिर अप्रैज़ल में C Grade लेकर एक बड़ा C बन जाता है। एक अभियान उस जूलिएट के लिए भी चले जो लिफ्ट खराब होने पर अपना १० किलो का राशन का झोला यह कह के शर्मा जी को पकड़ा देती है की अरे शर्मा जी आप तो बड़े फिट है , क्या मेरा बैग पांचवें माले तक ले चलेंगे ? और शर्मा जी छाती फुलाकर जब पाचंवे माले पर झोला देते है तो यही मैडम थैंक यू भैया कहके छाती पंक्चर कर देती है।

अगर आप हमारी बातो से सहमत है तो इस सन्देश को फैला दो ताकि यह सरकार तक पहुँच  जाये। और हाँ चलते चलते एक और बात कहनी थी कि सुना है अवैध कतलखाने भी बंद हो गए है , फिर भी हुस्न बालाएं अपनी  एक मुस्कान से कितने कितने दिलो का क़त्ल किये जा रही है , जरा इस और भी ध्यान दिया जाये।

चलते है , फिर मिलेंगे। राम और रोमियों से बेख़बर होके जरा रम की एक्सपायरी डेट देख लेते है। 



चित्र गूगल जी की मेहरबानी से
 

किस्सा

 किस्सा 


अधूरे ख्वाबो की सच्ची कहानी थी , कह गया। 
तेरी तमाम यादों का किस्सा क़तरा - क़तरा बन आँखों से बह  गया। 


टुटा, बिखरा , चूर हुआ , दिल ही तो था, मेरा था मेरे पास ही रह गया। 





ट्रैन वाली लड़की

डिस्क्लेमर: यह लघुकथा पूर्णतः मेरी कल्पनाओ के परिंदों की उड़ान का परिणाम है।इसका किसी जीवित इंसान, पशु, पक्षी, भूत, प्रेत आदि से कोई सरोकार नही है। एक और बात, यह कथा किसी घटना, किताब, फ़िल्म या किसी और की रचना से प्रेरित भी नही है, अगर ऐसा हुआ तो यह मात्र एक संयोग होगा।
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मैं और शिखा आज बड़े दिनों बाद ट्रैन के स्लीपर कोच में एक साथ उर्दू वाला सफ़र कर रहे है। वैसे तो बीते कुछ वर्षो  में एक दूसरे के साथ अंग्रेजी वाला ही सफर किया है हमने। शायद यह आखिरी बार हो की हम साथ हो।
जी हाँ मैं उसे उसके घर छोड़ने जा रहा हूँ, हमेशा के लिए। आखिर कब तक सहेगी वो और मैं भी। बीते वर्षो में हमारा  रिश्ता गरम चाय से कोल्ड कॉफी में बदल चूका है। कहने सुनने को अब सिर्फ ताने और गालियां ही है।

शिखा विंडो सीट पर बैठी है और उसके सामने बीच वाली सीट पर मैं । वो खिड़की से बाहर अपनी सूजी आँखों से टकटकी लगाये देखे जा रही है और में उसे। उसे देखकर लगा की कहीं फिर से दिल की कार्यवाही शुरू न हो जाये। कहीं फिर से भावनाओ के वो अंगारे दहक न उठे जिनकी अग्नि में हमने फेरे लिए थे। अपने बुझे हुए रिश्ते के महक उठने का डर नहीं था मुझे । डर यह था की कहीं फिर से इस रिश्ते को संभाल पाने में नाकाम रहा तो ?

ट्रैन चल पड़ी थी मुझे शिखा के चेहरे की सिवाए न कुछ दिख रहा था और न कुछ सुनायी दे रहा था। इस ट्रैन की यात्रा से ६ साल पहले वाली एक ट्रैन यात्रा याद आ गयी। ६ साल पहले जब मुस्कराहट मेरे करीब रहा करती थी और मैं  इसी मुस्कान को बांटने की कोशिश किया करता था। यह वो उम्र थी जब किसी इंसान का दिल किसी तितली की तरह उड़ा करता है।

 ६ साल पहले

विंडो सीट पर वो आलथी पालथी मार के  किसी  किताब में अपनी ऑंखें चश्मे सहित गड़ाए हुए बैठी थी ,  उसके पास एक अंकलजी टाइप के भाईसाब बैठे थे जो उससे काफी दूरी पर थे।  मैने  अपना बैग ऊपर वाली सीट पर फेंका और उन दोनों के बीच में जा धंसा। वैसे भी मेरी मिडिल बर्थ थी तो लॉजिकली मैं सही बैठा था। थोड़ी देर तक मैं अपनी मुंडी इधर उधर करके, अपनी आँखें मसलते हुए उसको ध्यान से देखने की (ताड़ने की) कोशिश  करता रहा और सफल भी हुआ । 
अब मैं अगर यहाँ  उसके रंग रूप और उसके पहनावे की चर्चा न करू तो आप लोगो को "इमेजिन" करने में बड़ी ही दिक्कतें आएँगी, आपको तो आदत पड़  चुकी है अंग्रेजी किताबें पढ़ पढ़ के, जब तक पूरा सीन "डिस्क्राईब" न करो तब तक आपको "इंटरेस्ट" आता ही नहीं ।  तो लीजिये सुनिए उसने चटख नीले कलर का टॉप पहना हुआ था , (राउंड नेक फुल्ली कवर्ड) जिसपर अंग्रेजी में कुछ लिखा था जो ठीक से  मैं पढ़ नहीं पाया (बिकॉज़ ऑफ़ ऑब्वियस रीज़न्स)  और एक सतरंगी सा ढीला ढाला  पायजामा पहना हुआ था। चेहरे की नक्काशी शायद खुद भगवान ने फ़ुरसत में  बैठ के करी थी। बाल उसके घुंगराले थे, जो ज्यादा लम्बे नहीं थे और खुले हुए थे और बार बार उसके चश्मे के आगे आ कर उसको परेशान कर रहे थे। चश्मे के अंदर बड़ी बड़ी गोल गोल आँखें थी जो किताब के पन्नो पर बड़ी तेज़ी से बाएं -दायें घूमे जा रही थी।  मन तो हो रहा था की अपने हाथो से ही उसकी लटो को उसी के कान के पीछे खोंस दू, परन्तु फिर जल्दी ही अहसास हो गया की मैं कौन हूँ, वो कौन है और हम कहाँ है। कईं बार आपको आपकी औकात बड़ी जल्दी और टाइम पर याद आ जाती है तो आप शरीफो की श्रेणी में आ जाते हो और अगर समय पर अपनी औकात याद न आये और कोई ओर याद दिलाये तो फिर आप  शरीफ नहीं रह जाते।

In short कहु तो जिंदगी में कभी किसी ट्रैन के स्लीपर कोच में ऐसी लड़की मैंने आज तक नहीं देखी थी जैसी वो थी, ऐसी लड़की के लिए हमारा एक मित्र "रुई की गुड़िया" की उपाधि दिया करता था, बस समझ लो रुई की गुड़िया जैसी ही थी वो। अब तो उसका चित्रण आपके मस्तिष्क में हो ही चूका होगा।



इससे कुछ ही देर पहले: 

मैं भागता दौड़ता हुआ प्लेटफॉर्म ६ पर खड़ी संपर्क क्रांति एक्सप्रेस के स्लीपर कोच S-5 में जैसे तैसे दाखिल हुआ ही सही की ट्रैन चल पड़ी, कुछ एकाध मिनट भी लेट होता तो या तो चलती ट्रैन में लटकना पड़ता या स्टेशन पर ही लटका रहता। मैं बैंगलोर से दिल्ली जा रहा हूँ, टिकिट मैने करवाया था जो वेटिंग २३ से खिसक के ४ पर आ गया था परन्तु  इसके आगे न बढ़ सका। और तत्काल में हमसे टिकिट आज तक बुक नहीं हुआ, IRCTC पर तत्काल में  टिकिट बुक करना बिलकुल वैसा है जैसे किसी स्वयंवर में राजकुमारी से ब्याहना या पहली ही बार में IIT के लिए चुन लिए जाना। मैं  वेटिंग टिकिट के साथ ही चढ़ गया और TTE का पीछा तब तक नहीं छोड़ा जब तक की उसने मुझे झुंझलाकर ही सही एक सीट दे दी। मेरी वेटिंग वाली टिकिट पर S6-10 लिख के एक गोला बनाया और ४७५ रुपये की एक रसीद फाड़ दी। ( एक्स्ट्रा रुपये भी लिए उसने बिना रसीद के जो मैं यहाँ आपको बताना नहीं चाहता, दिल्ली वाला हूँ न, भ्रष्टाचार ख़िलाफ़)

टिकिट में सीट कन्फर्म पाकर मुझे बिलकुल वैसा अहसास हुआ जैसे मैनेजमेंट कोटे में एक प्राइवेट इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिलने पर हुआ था आज से ७ साल पहले।

मैं घूमता हुआ सीधा अपनी निर्धारित सीट पर पहुँचा तो अचानक से ट्रैन की बदबू एक अजीब सा सुकून देने वाली  खुशबू में बदल गयी।जिंदगी कुछ देर के लिए स्लो मोशन हो गयी। कम्पार्टमेंट की विंडो सीट पर वो आलथी पालथी मार के  किसी  किताब में अपनी ऑंखें चश्मे सहित गड़ाए हुए बैठी थी , उसके पास एक अंकलजी टाइप के भाई साब बैठे थे जो उससे काफी दूरी पर थे।  मैने  अपना बैग ऊपर वाली सीट पर फेंका और उन दोनों के बीच में जा धंसा। वैसे भी मेरी मिडिल बर्थ थी तो लॉजिकली मैं सही बैठा था। थोड़ी देर तक मैं अपनी मुंडी इधर उधर करके, अपनी आँखें मसलते हुए उसको ध्यान से देखने की (ताड़ने की) कोशिश  करता रहा और सफल भी हुआ।

नोवेम्बर का महीना था, शाम के ६ बज रहे थे और ट्रैन की खिड़की से अच्छी खासी ठंडी हवा आ रही थी, पर इन सब से बेखबर वो अपनी किताब को ऐसे पढ़े जा रही थी जैसे थोड़ी देर में TTE उसकी परीक्षा लेगा और वो  पास हो गयी तो उसका टिकिट अपग्रेड करके 1st AC कर देगा।
मैं भी इधर उधर देखता रहा और अपने मोबाइल से खेल करता बैठा रहा, इतने में खाने वाला आर्डर लेने आया तो पुरे कम्पार्टमेंट में मैं ही अभागा था जिसने ट्रैन के खाने का आर्डर दिया बाकी सब शायद अपना अपना खाना लेकर आये थे।
चलो, खाने वाले को देखकर ही सही, "रुई की गुड़िया" को याद तो आया की उसको भी भूख लग रही है। उसने अपने बैग में से डिब्बा निकाला और एक रोल किया हुआ पराठा लेकर खाने लगी, एक मिनट के लिए मेरी नाक, नज़र और दिमाग सिर्फ पराठे पर ही केंद्रित हो गए थे। खुशबू से मालूम पड़ रहा था की पराठे में आलू मटर की सब्जी और अचार का मसाला भरा हुआ था। उस पत्थर दिल ने "फॉर्मेलिटी" के लिए ही सही पर एक बार भी "ट्रैन एटिकेट्स" दिखाते हुए यह नहीं पूछा की "Would you like to Have it..?" . खैर जाने दो, मेरा भी शाही पनीर, दाल तड़का, जीरा राइस और तंदूरी रोटी आ चुके थे, हाँ हाँ वही ट्रैन वाला खाना जिसको मेने यह सब "इमॅजिन" करके जैसे तैसे खा लिया, बदले में मैंने भी किसी से नहीं पूछा "Would you like to have it..?.

रात के ९ बज चुके थे, ऊपर की बर्थ वाले अंकल ऊपर जाकर फ़ैल चुके थे, सामने भी अंकल आंटी जी चादर बिछा के, तकिये में हवा भर के गुड नाईट की तयारी कर चुके थे, सामने की मिडिल बर्थ उठाई जा चुकी थी और लगेज में चैन बाँधी जा चुकी थी। और इधर उसकी किताब अभी भी खत्म नहीं हुयी थी, भला कोई इतनी देर सतत कैसे पढ़ सकता है। इन सब के बीच मेरे फ़ोन की मैसेज बाजी चालू थी जो मैं रह रह कर "उससे" नज़रे चुराके किये जा रहा था ,
 ये मेसेज में अपनी छोटी बहन रिया को किये जा रहा था जो मेरी टांग खींचने में लगी थी।दर-असल हुआ ये की इस बार की छुट्टियों में घरवालो ने मेरे लिए कुछ ख़ास इंतेजाम करके रखा था। रिया उन्ही सब इंतजामो की पोल खोल रही थी। उसने मुझे बताया की कैसे मुझे बकरा बना कर शादी के लिए लड़की देखने ले जाया जायेगा।

यह उम्र कुछ ऐसी होती है की आदमी चाहता है की वो जिंदगी में कुछ तरक्की करे, कुछ नाम और बैंक-बैलेंस कमा ले, थोड़ा अपनी आज़ादी को खुलके जी ले और इसी समय घरवाले धर्मसंकट खड़ा कर देते है शादी जैसी बातें करके।

ठंडी बढ़ने लगी है, ट्रैन के पंखो को भी आराम दे दिया गया है और सारी खिड़कियों के शटर गिरा दिए है, सिवाए उसकी खिड़की के। उसने बहुत कोशिश करी खिड़की बंद करने की और फिर अंत में वो मकाम आ ही गया जिसका में बेसब्री से इन्तेजार कर रहा था।
                      -"can you please help me to shut this window ?"  उसने अपने गुलाब की पंखुड़ी जैसे होठो को पहली बार खोला और अपने मुख कमल से इतने सारे अंग्रेजी के शब्दो की अविरल धारा प्रवाहित कर दी की मुझे कुछ समझ नहीं आया। उसके अंग्रेजी शब्द मेरी समझ में बिलकुल नहीं आये इसलिए नहीं की मैं हिंदी माध्यम का विद्यार्थी रहा हूँ बलकि इस लिए की मुझे पहली बार "घिग्गी बंधना" मुहावरे का वास्तविक जीवन में अर्थ समझ आ रहा था। मैंने कुछ कहने के लिए मुँह खोला  किन्तु मेरे शब्द सरकारी अनुदान की तरह कहीं अटक  गए केवल मुँह  खुला रह गया। इससे पहले की मेरे खुले मुंह से लार टपकती उसने फिर कुछ कहा।

'एक्सक्यूज़ मी ? आप प्लीज् यह खिड़की बंद कर देंगे ?'
अबकी बार उसने थोड़ी जोर से बोला और हिंदी में भी बोला जो पूरा पूरा समझ में भी आया और मैंने हाँ में मुंडी हिला के खिड़की बंद करने का प्रयास किया, यह प्रयास मेने सनी देओल की  शैली में किया किन्तु KRK की शैली में असफल हुआ। आज ट्रैन की इस तुच्छ सी खिड़की ने जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ा दिया कि जिनके नसीब फूटे हो वो कितनी ही कोशिश कर ले उनसे न खिड़की बंद होनी है और न ही लड़की इम्प्रेस होनी है ।
दर-असल उस खिड़की की चिटकनी खराब थी जो लग ही नहीं रही थी सो काम ऐसे ही चलाना था।
अब हमारी बात शुरू होने को थी।

'let it be like that, let's enjoy AC in sleeper coach, आप को नींद आ रही हो तो बता दीजियेगा, सीट ऊपर कर लेना'  रुई की गुड़िया ने मेरी तरफ देख के कहा,  इस बार मेरे शब्द अटके नहीं और मैने कहा 'नहीं नहीं मुझे अभी नहीं सोना। वो क्या है की  जब तक की मैं  खुद सोना न चाहु, मुझे नींद नहीं आती, आपको सोना हो तो आप बता देना'
मैंने बड़ा ही अजीब और घटिया सा डाइलोग मारा था जिसका अहसास भी मुझे हो गया था।

'अरे वाह यह तो बड़ी अच्छी बात है की आप जब चाहो तब सो सकते है , It's great ability, you know ?'
मुझे समझ नहीं आया की तारीफ कर रही है या टांग खीच रही है , खैर जो भी हो मैंने हेहेहे हीही ही करके बात आयी गयी कर दीऔर बात आगे बढ़ाने के उद्देश्य से एक निहायती साधारण और गैरवाज़िब सवाल दाग दिया।

'आप दिल्ली जा रही हो ?'
"हाँ , और आप ?" (उसके मुँह से "आप" सुनके लग गया था की यह दिल्ली वाली तो नहीं है )
"मैं भी।"
"कुछ काम से या घर है आपका वहां ?" उसने यह सवाल पूछा जिसका जवाब ईमानदारी से दिया ही नहीं जा सकता था मैंने कहा की "हाँ दिल्ली में ही घर है मेरा, बस घरवालो से मिलने जा रहा हूँ, और आप ?"

"ओह्ह गुड, नहीं मैं तो यूँही फ्रेंड्स से मिलने जा रही हूँ और मेरी एक कज़िन भी रहती है वहां"

मैंने दिल्ली वाले टॉपिक को बदलने के लिए बैंगलोर का टॉपिक छेड़ा बिलकुल वैसे ही जैसे जॉब इंटरव्यू में आप कोशिश करते हो की  सवाल उसी टॉपिक के आसपास पूछे जाये जिस टॉपिक पर आप मुँह खोलकर फेंक सकते हो। मैंने पूछा की "बैंगलोर में आप क्या करती है ? आईटी में हो क्या ?"

"No no, I am not into IT, I am doing a course in journalism from Hyderabad, अभी छुट्टियों में बैंगलोर अपने घर गयी थी, अभी २ दिन दिल्ली में रहूंगी and then back to Hyderabad."

जब आपको कोई और प्रोफेशन का बंदा या बंदी मिल जाये तो आप अपने प्रोफेशन के बारे में सहूलियत से फेंक सकते हो ठीक वैसे ही जैसे नेता लोग अपने भाषणो में करते है।

कुछ देर हम यूँही एक दूसरे को अपने बारे में फेंकते रहे, कुछ रियलिटी तो कुछ फिक्शन और इतने में रात के १२ बज गए थे। अब मुझे जर्नलिज़्म की बातें स्कूल के लास्ट पीरियड वाले सब्जेक्ट जैसी लगने लगी थी परन्तु लास्ट लेक्चर में भी अगर टीचर इतनी खूबसूरत हो तो कौन कमबख्त चाहेगा की छुट्टी की घंटी बजे। लेकिन मेरी जिंदगी में ३ ही कमजोरियां है ,  खाना,सोना और लड़कियाँ और इनकी रेटिंग भी इसी क्रम में है। ज़ाहिर सी बात थी अब नींद आने को थी और मुझे सोने से कोई नहीं रोक सकता था। मैंने खिड़की बंद करने की एक और असफल कोशिश की। घर से निकलते वक़्त मैंने कुछ न्यूज़ पेपर्स अपने बैग में रखे थे यह सोच कर की अगर सीट न मिली तो कही भी यह पेपर्स बिछा के सो जाऊंगा। वही न्यूज़ पेपर्स काम आये और खिड़की को जैसे तैसे एयरटाइट पैक किया। लड़की के इम्प्रेस होने का तो पता नहीं पर खिड़की जरूर बंद हो गयी थी।

अभी मैंने अपनी मिडिल सीट उठा के सोने की तैयारी कर ली थी और अपनी "गुड नाईट" हो गयी थी। और वो भी अपने हिसाब से सो गयी थी।

सुबह उठे, गुड मॉर्निंग हुआ, चाय शाय  शेयरिंग हुयी और पूरा दिन गप्पे हांकने में और खाने पिने में बीत गया। हमने अपने नाम का आदान प्रदान भी किया। अगली सुबह गंतव्य याने दिल्ली के करीब पँहुच के जिंदगी में पहली बार लगा कि काश मंज़िल थोड़ी और दूर होती, काश के यह सफ़र यूँही उम्रभर चलता। खैर अब हम बिछड़ने को थे, उसकी आँखों को पढने की कोशिश कर ही रहा था की उसने गुड बाय बोल दिया और सरपट से भीड़ में न जाने कहाँ खो गयी।

मैं  भी अपने घर की और निकल गया। अजीब कीकश्मकश थी मुझे शादी के लिए लड़की देखने जाना था और में ट्रैन में ही उस अजनबी सी लड़की को दिल दे बैठा था , क्या यह वाकई में इश्क़ था या वो क्या कहते है अंग्रेजी में infatuation , समझ नहीं आ रहा था। वैसे जिस लड़की को देखने जाना था वो भी दिल्ली में नहीं कहीं और रहती है , यहाँ उसके मामा के यहाँ उसको बुलाया गया है।

अनमने मन से तैयार होकर निकल पड़ा पापा , मम्मी  और रिया के साथ लड़की देखने। रास्ते भर मुझे बस शिखा याने की ट्रैन वाली लड़की का ही ख़याल आता रहा।

लड़की वालो के यहाँ पहुँचे और लड़की के मामा मामी से सामना हुआ, कुछ देर मेरा इंटेरोगेशन करने के बाद उन्होंने आवाज़ लगायी शिखा बेटा  यहाँ आओ। और जैसे ही वो सामने आयी मेरे हलक से पानी सुख  गया, हाथ से रसगुल्ला छूट गया और न जाने कौन कौन से हार्मोन शरीर में मिक्स एंड मैच होके ऊधम मचाने लगे। जी हाँ, यह वही शिखा है जिसे हम ट्रैन में ही अपना दिल दे बैठे थे। उनका भी हाल कुछ ऐसा ही था।

बस फिर क्या था एक दो मुलाक़ातों में वो भी हम पर जां निसार कर बैठे और हमने शादी कर ली।


आज का दिन

शादी के ६ सालो में हम जिंदगी की आपाधापी में कहीं एक दूसरे से दूर से हो गए थे, काम का बोझ, शहर की दौड़ वाली दिनचर्या इंसानो को मशीन बना देती है। कईं दिनों के बाद, या सालो के बाद आज में शिखा को इतना गौर से देख रहा था, मुझे फिर से प्यार हो रहा था।  में शिखा से कितना कुछ कहना चाहता था -
शिखा, क्यों न हम एक कोशिश और करके देखे ? क्यों न हम फिर से प्यार में पड़ कर देखें ? क्यों न फिर से तुम "रुईं की गुड़िया" बन जाओ ? सब कुछ भुलाकर फिर से नयी शुरुआत करे ? खोल दो अपनी इन ज़ुल्फो को और मुझे सो जाने दो इनकी छाँव में, अपने नरम मुलायम हाथो से  छू कर मेरे इस पत्थर जैसे दिल को फिर धड़कना सीखा दो। प्लीज, एक बार फिर से अपनी कोमल मुस्कान से मेरे चेहरे पर मोती बिखरा दो। कितना कुछ माँगना चाहता हूँ तुमसे।






एकदम कोरी कल्पना को मैने पन्नो पर उतारने की एक छोटी कोशिश की है आशा है आपको पसंद आये। 

चित्र गूगल इमेज सर्च का परिणाम है , परंतु है बढ़िया।


Thursday, 4 August 2016

दिल्ली की सैर



भारत में लोग-बाग अपने फेवरेट सितारों से मिलने बम्बई जाते है, एक झलक पाने को घंटो हजारो की भीड़ में खड़े रहते है। कुछ बावले लोग तो चुपके से सितारों के घरो में घुस तक जाते है और आराम से घूम-घाम के सकुशल लौट भी आते है। अभी हाल ही में एक भाईसाब ने पुरे ९ घंटे अमिताभ बच्चन के घर में गुजारे वो भी बगैर किसी को भनक लगे।
जब मैंने ये ख़बर पढ़ी तो सोचा की क्यों न मैं भी अपने पसंदीदा मनोरंजक सितारों के दर्शन के लिए उनके घर में घुसपैठ करूँ ? बस यही सोच के मैंने प्लान बनाया दिल्ली सैर का। अजी हाँ मेरा मनोरंजन करने वाले सभी सितारे दिल्ली में ही रहते है।


तो भाईसाब हम पंहुचे दिल्ली और सबसे पहले घुसे अपने नंबर १ मनोरंजक सितारे के बैडरूम में। इस सुपरस्टार को लोग प्यार से पप्पू बुलाते है। ये एक बहुत बड़े खानदान के वारिस है। जैसे ही छुपते -छुपाते इनके घर में दाखिल हुए तो हमने देखा की कमरे के एक कोने में कुछ बुझी हुयी चिलम पड़ी थी, सेंटर टेबल पर कुछ क्रेडिट कार्ड्स और कोई सफ़ेद पाउडर बिखरा पड़ा था टीवी पर फुल वॉल्यूम में डोरीमोन का कार्टून चल रहा था, थोड़ा और नज़र को इधर उधर दौड़ाया तो पाया की ये जनाब अपने पुरे घर में फ़ोन लेकर दौड़ लगा रहे थे। थोड़ा और नज़दीक से जानने की कोशिश की तो हमने पाया की ये तो पोकेमोन-गो नामक मोबाइल गेम खेल रहे थे वो भी घर के अंदर क्योंकि मम्मी ने बाहर जाने से मना किया है। बड़ा अच्छा लगा इन्हें इतना नज़दीक से देखकर। जैसे बाल-गोपाल की कलाएं देखकर गोकुलवासियों का मन मोहित होता होगा बिलकुल वैसे ही हम बाबा को देखकर मोहित होते रहे।

वहाँ से निकल कर फिर हम घुसे ७-रेसकोर्स रोड वाले बंगले में, यकीन मानिये बड़ी आराम से घुस गए यहाँ भी। रात हो चुकी थी और इसी अँधेरे का फायदा उठा कर हम नमो जी के कमरे में घुस गए। ये चमकती सफ़ेद दाढ़ी क्या खूब चांदनी बिखेर रही थी। वो अपनी कुर्सी पर बैठकर कोई किताब बांच रहे थे , शीर्षक थोड़ी देर तक तो नहीं देख पाया अंग्रेजी में था किन्तु थोड़ी मशक्कत के बाद पता चल ही गया उनकी किताब का नाम -Gulliver's Travels था। उनके कमरे की दिवार पर दुनिया का नक्शा टंगा हुआ था और लगभग आधे नक़्शे पर हरे और लाल रंग के पिन घुसे हुए थे। शायद ये पिन इंगित कर रहे थे कि नक़्शे की ये जगहें जहाँ जहाँ पिन लगी थी सारी नमोजी की चरणधूलि पाके धन्य हो चुकी थी। किन्तु लाल और हरे का मतलब क्या हुआ भला? एक लाल पिन हमारे प्रिय पडौसी देश के सीने पर भी घुसी हुयी थी। ओह मतलब समझा हरी पिन मतलब जहाँ आमंत्रण पर पधारे थे और लाल पिन मतलब जहाँ जाके नमोजी ने कहा था "सरप्राईज़ ". . .
बस अब इतनी संवेदनशील जगह पर ज्यादा समय नहीं बिता सकता था तो चुपचाप मैं वहां से कूच कर गया।

अगला और अंतिम पड़ाव था भारत के सबसे ज्यादा चर्चित और चहेते CM का घर। प्यार से इनको भी कईं नाम दिए गए है परंतु इन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। पहले धरने-आंदोलनों से और फिर ट्विटर के माध्यम से ये कईं लोगो का मनोरंजन करते आ रहे है। रात हो चुकी थी मैं गलती से इनके बैडरूम में दाखिल हो गया था सो डर और शर्म के मारे इनके बेड के नीचे जाके घुस गया था। तभी भाईसाब और भाभी जी आये मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था की यहाँ से कैसे निकलूँ इसलिए चुपचाप वहीं इनके सोने का इंतजार करता रहा। अब आपको पता ही है कि किसी दंपत्ति के बैडरूम चुपके से उनकी बातें सुनना जुर्म है और उन बातो को फिर ज़माने को बताना तो घोर अपराध है। किन्तु लाख कोशिशो के बावज़ूद मैं खुद को रोक नहीं पाया, न सुनने से न ही सुनाने से। तो सुनिये :
मैडम : कितने दिन हो गए आपने रोमांस तो क्या रोमांटिक बातें भी नहीं करी मुझसे। कितने साल हो गए आप मुझे फिल्म दिखाने भी नहीं ले गए हर बार उस मुए मनीष को ले जाते हो। आखिर कब तक चलेगा ऐसा ?
भाई साहब खांसते हुए और मफलर को उतार के साइड में रखते हुए बोले : जानू मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ ये मुझे ट्वीट करके बताने की जरुरत नहीं। मैं तुम्हे डेट पे ले जाना चाहता हूँ, बच्चो को पिकनिक पे ले जाना चाहता हूँ, तुम्हे फिर से पहले जैसा रोमांस करना चाहता हूँ पर क्या करूँ ? मुझे मोदीजी ये सब करने ही नहीं देते।

इतने में मेरी आँख लग गयी और जब खुली तो खुद को अपने कमरे में स्वयं के बिस्तर पर पाया। धत्त तेरे की ये दिल्ली की मनमोहक सैर तो एक स्वप्नदोष निकल गया मेरा मतलब दोषपूर्ण स्वप्न निकल गया।

 नोट: चित्र गूगल इमेज सर्च के सौजन्य से

Tuesday, 14 June 2016

पहली बारिश



बारिश की पहली बौछार, बिजली की चमकार, मिट्टी की सौंधी महक और पहला -पहला प्यार। अरे अरे आप तो रोमांटिक होने लगे , रुकिए तो सही। श्रृंगार रस  से भरी ये बातें अब जवानी में अच्छी लगती है किन्तु बचपन में तो इन सबके मायने अलग ही हुआ करते थे।

वैसे तो इस पहली बारिश के मायने धरती पर निवास करने वाली हर प्रजाति के हर उम्र, लिंग, और व्यवसाय के हिसाब से अलग अलग हो सकते है। परन्तु मैँ आज संक्षिप्त में बचपन की ही बात करूँगा।

जून का आधा महीना बीत जाने के बाद जैसे ही मौसम सुहाना होने लगता, बादलों का झुण्ड आवारागर्दी करते हुए बरसने को बेचैन होता, बिजलियाँ लूप-झूप करने लगती वैसे ही हमारे दिलो की धड़कने बढ़ने लगतीं थी। यहाँ धड़कनो का ताल्लुक कतई रोमांटिक भावनाओ से नहीं है।  ये पहली बारिश संकेत होती थी गर्मी की छुट्टियां ख़त्म होने का, ये कड़कती बिजलियाँ कहती थी बंद करो ये क्रिकेट और गरजते बादल संदेसा लाते थे की अब स्कूल शुरू होने को है,और इसीलिए तेज़ होती थी धड़कने।



हर इंसान को ईश्वर का वरदान होता है की जो चीज वो टाल नहीं सकता उसके साथ ताल-मेल बैठा ही लेता है। फिर चाहे वो शादी हो, नौकरी हो या स्कूल। इसी प्रकार छुट्टियों का खत्म होना, स्कूल का खुलना और पढ़ाई का शुरू होना वो घटनाएँ थी जिन्हे टाला नहीं जा सकता था। इसलिए इन सब के साथ ताल-मेल बैठाया जाता था इस लालच के साथ की अब सब कुछ नया नया होने को है। नयी क्लास, नयी किताबें, नया बस्ता ( स्कूल बैग) नयी यूनिफार्म और भी कईं चीजे।

तब मिट्टी की खुशबू से ज्यादा अच्छी लगती थी नयी किताबों की महक, जिस प्रकार पहली पहली बूंदे सुखी पड़ी जमीन को भिगोती थी उसी प्रकार नयी-नयी पेंसिल से कोरी कोरी नोटबुक पर नाम लिखा जाता था। 
नाम -> प्रितेश दुबे 
विषय -> हिंदी 
कक्षा ->४ थी 
 जैसे पहली बारिश धरती को धानी चुनर से ढँक देती थी उसी प्रकार हम अपनी किताबो को भूरे कवर से ढंका करते थे। स्कूल खुलने के समय की खरीदी किसी शादी ब्याह की शॉपिंग से कम न होती थी। घर का माहौल स्कूलमय हो जाया करता था। पापा किताबो पर कवर चढ़ाते और माँ यूनिफार्म की फिटिंग सही करती। और हम अपने नए बस्ते को ज़माने में व्यस्त रहते। 
और हाँ WWF के पहलवानो वाले, डिज़्नी के कार्टून वाले और क्रिकेटर्स के फोटो वाले स्टिकर्स का तो बोलना भूल ही गया। 

ऐसा नहीं है की पहली बारिश सिर्फ हमारी धड़कने तेज़ करती थी बल्कि पापा को भी मन ही मन परेशान करती थी। स्कूल खुलने पर हमारा नया बस्ता तो नयी किताबो-कॉपियों से भर जाता था परन्तु शायद उनका बस्ता (बटुआ)खाली हो जाया करता था। जो चीज टाली  नहीं जा सकती उसके साथ ताल-मेल बिठाना भी तो उन्होंने ही सिखाया था तो वो भी इस परिस्थिति से ताल-मेल बैठा ही लेते थे हर बार। 

बारिश तब भी आती थी, बारिश अब भी आती है। स्कूल तब भी खुलते थे, स्कूल अब भी खुलते है। पापाओं की जेब तब भी खाली होती थी और अब भी खाली होती है। सब कुछ वैसा का वैसा है सिवाए बचपन के। बचपन अब वैसा नहीं रहा।



Thursday, 14 April 2016

बाबा साहेब आंबेडकर

बाबा साहेब आंबेडकर की १२6 वीं  जयंती मनाई जा रही है और बड़े धूमधाम से ही मनाई जा रही है। पिछले कुछ दिनों से चंदा उगाही का कारोबार भी चल रहा है। हमारे देश में कोई भी महोत्सव चाहे वो धार्मिक हो, राजनैतिक हो या सामाजिक हो उसकी तैयारी बड़े जोरो शोरो से होती है। "जोर" लगा लगा के चन्दा उगाया जाता और फिर उस चंदे से हाई वोल्टेज DJ वाले बाबुओं से "शोर" करवाया जाता है। ऐसा अमूमन सभी प्रमुख महोत्सवों के दौरान होता है। (सभी मतलब सभी)

हाँ तो हम बात कर रहे थे बाबासाहेब आंबेडकर की १२6 वीं  जयंती की तो सभी राजनैतिक दल, सामाजिक कार्यकर्ता, और दलितों के, पिछड़ो के मसीहा लोग आज के दिन अपने वातानुकूलित ऐशो -आराम छोड़ के १-२ जगह भाषण देंगे, पिछली, मौजूदा और आने वाली सभी सरकारों को गरियाएंगे और घर जाके २-४ पेग मार के सो जायेंगे। ऐसा ही होता आया है बरसो से।



बरसो से हम सब के मन में राजनैतिक दलों ने बाबासाहेब की एक छवि बना दी है की वो दलित नेता थे। बाबासाहेब का योगदान सिर्फ दलितों के उत्थान के लिए ही सिमित था। हमारी भी स्कूली किताबो ने हमे ज्यादा कुछ नहीं पढ़ाया बाबासाहेब के बारे में सिवाए इसके की वो हमारे संविधान के निर्माता थे।

बाबासाहेब आंबेडकर को इतना "सेलिब्रेट" करने वाले भी उनके कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण योगदानों के बारे में शायद ही जानते होंगे। आइए आपको बताता हूँ की "भारत के आज़ाद होने के बाद" बाबासाहेब का क्या क्या योगदान रहा है देश के लिए। (जो वाक्य बोल्ड और रेखांकित है उसका महत्त्व भी आप समझेंगे लेख के अंत में ).

१. RBI को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, इसकी परिकल्पना बाबासाहेब ने की थी।

२. भारतीय वित्त आयोग जो की भारतीय राज्यों और केंद्र के बिच वित्त प्रबंधन की प्रमुख कड़ी है का गठन भी बाबासाहेब के प्रयासों से हुआ था।

३. संविधान में "हिन्दू कोड बिल" को कानूनी दर्जा दिलाने की जद्दोजहद भी आंबेडकर ने की थी, इस बिल का मकसद महिला सशक्तिकरण, सती प्रथा और दहेज़ प्रथा का उन्मूलन था। अगर यह बिल पास हो जाता तो १९५१ से ही असल "Women Empowerment" की शुरुआत हो जाती। परन्तु ऐसा हो नहीं पाया और २०१४ में राहुल गांधी को "Women Empowerment" शब्द के रट्टे लगाने पड़े।

४. श्रम मंत्री रहते हुए उन्होंने आधिकारिक कामकाज के घंटो को १२ से घटवा के ८ करवाया। (आईटी वालो को तो अब तक अपने बाबासाहेब का इंतजार है )

५. कश्मीर में आर्टिकल ३७०, जिसके बूते पर कईं सरकारे आई और गयी।  इसी आर्टिकल ३७० को पूरी तरह से नकारने का साहस भी बाबासाहेब ने दिखाया था। उन्होंने कश्मीरियों से कहा था की आप चाहते हो की आपकी सीमा सुरक्षा हम करे, आपको आर्थिक सहायता हम दे , आपको आपदा सहायता हम प्रदान करे और आप हमारे कानून नहीं मानेंगे , ऐसा कैसे हो सकता है ? ( हम मतलब भारत सरकार)
किन्तु आज बाबासाहेब के कईं अनुयायी JNU में आर्टिकल ३७० की वकालत करते है और कश्मीर की आज़ादी का बीड़ा उठाये है।

६. नेशनल पावर ग्रिड, राष्ट्रीय सिंचाई योजना जैसी कईं परियोजनाओं को क्रियान्वित करने में योगदान।
७. बौद्ध धर्म की परिस्थापना और
८. भारत के कईं राष्ट्रिय चिन्हों पर बौद्ध धर्म की छाप भी इन्ही के प्रयासों का परिणाम है।

और भी कईं चीजे मेरी व्यक्तिगत जानकारी के आभाव में छूट गयी है , किन्तु इतनी काफी है इस बात के प्रमाण के लिए की आधुनिक भारत की नींव रखने में उनका अच्छा ख़ासा योगदान रहा है। जिसे राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पिछली सरकारों ने प्रचारित नहीं किया।

उनके इन योगदानों को शायद कोई याद भी नहीं करना चाहता, क्योंकि ये पुरे देश के हित में थे। आजकल देश-हित  की बात करने वालो को "सूडो नेशनलिस्ट", "भक्त" या "संघी" कहा जाता है। और अगर बाबासाहेब के इन सभी योगदानों का जिक्र हो गया तो हंगामा खड़ा हो जायेगा। इसीलिए आजतक उन्हें सिर्फ और सिर्फ संविधान निर्माता और दलितों का नेता ही कहा जाता है।

अब चलते चलते आपको उस बोल्ड और रेखांकित वाक्य के बारे में भी कुछ जानकारी दे देते है। उनके उपरोक्त  सभी योगदान भारत के आज़ाद होने के बाद के थे जब उन्हें संवैधानिक ओहदा प्राप्त हुआ था। आज़ादी के पहले की उनकी सारी लड़ाई दलितों के उत्थान के लिए थी। यहाँ अगर कहा जाये कि उनकी लड़ाई अंग्रेजो के खिलाफ डायरेक्ट कभी नहीं रही तो भी असत्य नहीं होगा । उन्होंने अंग्रेजो से भी हाथ मिलाया था ताकि दलितों को अधिकार मिल सके। उन्हें कुछ हद तक कोई सरोकार नहीं था की देश में सरकार किसकी है। उनकी प्राथमिकता में सिर्फ पिछड़ो को आगे लाना था। कुछ एक मुद्दों पर वो गांधीजी के विरूद्ध भी खड़े हुए थे। उन्ही के प्रभाव के चलते आज़ादी के आंदोलन में दलितों का संगठित योगदान उतना अहम नहीं रहा है जितना हो सकता था।

और जहाँ तक रही बात दलितों के लिए काम करने की तो वो जरूर उन्होंने किया किन्तु अकेले उन्होंने किया ऐसा भी नहीं है। जातीप्रथा के खिलाफ अभियान और कईं रूढ़ियों को खत्म करने के लिए प्रमुख कदम उठाने वालो में जो नाम आते है वो राजाराममोहन राय, रबिन्द्र नाथ टैगोर, केशब चन्द्र सेन जैसे लोग है जो की ब्राह्मण थे। इनके अलावा बॉम्बे प्रार्थना समाज, आर्य समाज, सत्य साधक समाज इत्यादि ने भी सर्व कल्याण और मनुष्यो में समभाव  के लिए काम किया। बाबासाहेब ने एक वोटबैंक जरूर खड़ा किया और आज कईं राजनैतिक पार्टियां उसी वोटबैंक के लालच में "दलित-दलित " चिल्लाती फिर रही है।  आज शायद बाबासाहेब अपनी आँखों से यह सब देख रहे होते तो शायद उन्हें थोड़ा दुःख जरूर पहुँचता।

अगर हमारे पुरखो ने जाती प्रथा का प्रचलन शुरू किया और मनुष्यो को उनके कार्य के अनुसार विभाजित किया तो "Social Equality" की बात करने वाले लोगो ने इन्ही मनुष्यो के बिच बैर और घृणा को जन्म दिया। यह सामाजिक विभाजन अब इतना बढ़ चूका है की हम देश हित के बारे में अब भी नहीं सोच रहे है। अब भी हम सिर्फ हमारी जाती, हमारा धर्म, हमारा समाज इन्ही घेरो में अटके है।

हमारा देश तेज़ी से आगे तो बढ़ा है किन्तु ट्रेडमिल के ऊपर। सालो तक  भागने के बाद उतरे तो पाया की हम तो वहीं खड़े है।


नोट: इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहात करने का कतई नहीं है। हम बाबासाहेब आंबेडकर के कार्यो के लिए उनका भरपूर सम्मान करते है। किन्तु उनके नाम का दुरुपयोग करने वालो के सख्त विरुद्ध है। जिस प्रकार गांधी जी के नाम का भरपूर दुरूपयोग होता आया है वैसा ही कुछ लोग आंबेडकर के साथ करने जा रहे है।
फिर भी दिमाग की जगह अगर किसी का दिल दुखा हो तो लिखित में क्षमा चाहता हूँ और आशा करता हूँ की इस लेख के विरोध में कहीं आग-जनि, बंद या पत्थरबाजी नहीं होगी। धन्यवाद।

Tuesday, 2 February 2016

व्रत की महिमा


आगे पढ़ने से पहले एक बात आप समझ लें की यह लेख पूर्णतः पुरुषो के और विशेषतः भावनात्मक रूप से बंदी (शादीशुदा) पुरुषो के दृष्टिकोण से लिखा गया है।

तो जनाब तन की शक्ति, मन की शक्ति से कहीं बढ़कर है व्रत की शक्ति।जी हाँ सही पढ़ा आपने। व्रत की शक्ति को नज़रअंदाज करना आपके लिए हानिकारक हो सकता है। विशेषकर जब कि आपकी अर्धांगिनी फलां -फलां व्रत करती है।



 शादी के बाद जीवन में आने वाले बड़े-बड़े परिवर्तनों के बीच हम छोटे-छोटे परिवर्तनों पर गौर ही नहीं कर पाते है। जैसे कि जब आप सिंगल थे तब आपके कार्यक्षेत्र पर (प्रोजेक्ट में, ऑफिस, महाविद्यालय इत्यादि जगह ) आपके आसपास हमेशा खूबसूरती छायी रहती थी। आँखें कभी तरसती नहीं थी, इसीलिए तो आप सदैव प्रसन्न रहते थे। किन्तु शादी के बाद हालात ऐसे होते है जैसे नसीब केजरीवाल (U-Turn) बन गया हो।आप को लगता है जैसे आपके साथ काम करने वालो में अचानक से डाइवर्सिटी (विभिन्न जेंडर ) ख़त्म हो गयी है। एकाएक आपको अहसास होता कि धीरे धीरे आपके साथ काम करने वालो की लिस्ट में सिर्फ पुरुष ही रह गए है।

 शादी से पहले जब भी आप कहीं कोई यात्रा करते थे ट्रैन से, बस से, वायुयान इत्यादि से तो भी १० में से ८ बार आपकी यात्रा मंगलमयी ही रहती थी । आपकी बोगी में, या आपकी पास वाली सीट पर कोई न कोई सुन्दर बाला(या बालाएँ ) जरूर बैठी मिलती थी। जिनके सिर्फ वहाँ बैठे होने भर से ही ऐसा लगता था जैसे किसी ने हवा में खुशबू घोल दी हो। जैसे किसी ने सुमधुर सरगम के राग छेड़ दिए हो। अगर मैं ग़लत कह रहा हूँ तो बताईये ? होता था कि नहीं ऐसा शादी से पहले ?और अब जब आप शादीशुदा है तो जो चीज १० में से ८ बार होती थी वो १ बार ही होती है और वो भी तब जब कि आप सपरिवार(सपत्नीक) यात्रा कर रहे होते है।

आपकी शादी से पहले आपके कईं दोस्त हुआ करते थे उनमे लड़कियाँ भी होती थी और लडके भी, कुँवारे भी होते थे और शादीशुदा भी। परन्तु जैसे ही आप शादीशुदा हुए आपके दोस्तों की लिस्ट छोटी ही नहीं हो जाती बल्कि क्लासिफाइड भी हो जाती है। कुछ शादीशुदा बेवड़े दोस्त ही गुप्त रूप से उस लिस्ट की परमानेंट आइटम होते है जिनको लिस्ट से डिलीट कर दिए जाने के बाद भी आप हर बार रिसाईकल बिन से रिस्टोर कर लाते हो।

कुलमिलाकर अगर कहा जाये तो शादी के बाद आप ही नहीं बदल जाते, आपका नसीब भी बदल जाता है।

ऊपर जितनी भी बातें लिखी है ऐसा सब कुछ होने के पीछे क्या कारण हो सकता है कभी आपने सोंचा है ? मैं बताता हूँ ,कभी आपने ग़ौर किया है कि भले ही आपकी पत्नी कभी कोई व्रत रेगुलर बेसिस पर न करे परन्तु साल में कोई न कोई एक व्रत पकड़ के कर ही लेती है। बस यही व्रत आपके इस नसीब के स्विच का कारण बनता है। ईश्वर और किसी की सुनें  न सुनें परन्तु व्रत करने वाली स्त्री की अवश्य सुनता है। आपने बचपन से सुना होगा कि बीवियों के व्रत से पतियों की उम्र बढ़ती है , बिलकुल सही सुना है। जब उनके व्रत के प्रभाव से आपको अपने शादीशुदा जीवन के बाहर विचरण (एक्स्ट्रा मैरिटल) करने का मौका ही नहीं मिलेगा, आपको किसी गलत राह पर जाने की छूट ही नहीं मिलेगी तो आप पथ से भटकेंगे ही नहीं। और जब आप पथ से भटकेंगे नहीं तो बीवी के प्रति वफादार रहेंगे, ईमानदार रहेंगे और जब तक बीवी के प्रति वफादार रहेंगे तब तक ज़िंदा रहेंगे और न केवल ज़िंदा बल्कि लम्बे समय तक ज़िंदा रहेंगे।

अगर आपकी शादी हो चुकी है तो आप शायद ऊपर लिखी सारी बक़वास समझ पाएं।परन्तु अगर आप अब तक सिंगल है और प्रसन्न है तो दुनिया के किसी कोने में कोई तो होगी जो आपकी प्रसन्नता भंग करने के लिए (आपसे विवाह करने के लिए) कोई न कोई व्रत कर ही रही होगी।

तो जनाब नारी की शक्ति तो अपरम्पार है ही, उनकी व्रत के शक्ति भी कम नहीं है।




चित्र गूगल इमेज सर्च के सौजन्य से






Thursday, 28 January 2016

बड़े बाबू

डिस्क्लेमर:   हो सकता है की यह लेख मेरी कोरी कल्पना का नतीजा हो, हो सकता है इसका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई लेना देना न हो।  अगर यह लेख पढ़ते समय आपका सामना किसी जीवित या मृत व्यक्ति के व्यक्तित्व से हो जाये तो हो सकता है यह भी संयोग मात्र हो।
और एक बात, इस लेख को लिखते समय किसी भी जीव- जंतु, पेड़-पौधे या कोई भी प्राणी को कोई क्षति नहीं पंहुचायी गयी है।

तो बैठे बैठे क्या करे, करना है कुछ काम, आओ बतोलेबाजी करे लेकर बाबूजी का नाम।

एक होते है बाबूजी, जो हर फिलम, टीवी और लगभग हर इंसान के असली जीवन में होते है। जो कभी नरम  तो कभी सख्त, कभी अच्छे तो कभी खडूस, कभी "कूल" तो कभी संस्कारी होते है। ऐसे सभी बाबूजी को प्रणाम करके बात करते है बड़े बाबू की।

 जी हाँ, बड़े बाबू वही जो ज्यादातर सरकारी दफ्तरों में सुनाई दिखाई पड़ते है। जिन तक पहुँचना मुश्किल ही नहीं कभी कभी नामुमकिन होता है। ऐसे बड़े बाबू सिर्फ सरकारी दफ्तरों में ही नहीं, प्राइवेट दफ्तरों, स्कूलों, अस्पतालों, बैंको और यहाँ तक की शादियों में भी फूफा के रूप पाये जाते है।

हमने अपने पिछले लेख में आपको एक प्रजाति से अवगत कराया था जिसे मैनेजर कहते है। अब जैसे शेर जो है वो बिल्ली की नसल का है , छिपकली जो है वो डाईनासौर के खानदान की है और जैसे भेड़िया, कुत्तो के कुटुंब का प्राणी है ठीक वैसे ही मैनेजर जो है वो बड़े बाबू की ही नस्ल के प्राणी होते है किन्तु बड़े बाबू के आगे कुछ नहीं लगते। बड़े बाबुओं की तुलना में मैनेजर निहायती सीधा, सरल और उपजाऊ प्राणी होता है।



कुछ एक अपवादों (Exceptional Cases) को छोड़ दो तो बड़े बाबू बनने के लिए ज्यादा हुनर या किसी विशेष गुण या अत्यधिक परिश्रम करने की आवश्यकता नहीं होती है। चाहिए तो सिर्फ एक लम्बा कार्यकाल,  ४० पार की उमर और एक लम्बी जबान। जी हाँ कार्यकाल लम्बा होगा तो उसको अनुभव माना जायेगा (आप कहोगे की लम्बा कार्यकाल होना और अच्छा अनुभव होना अलग है तो मैं कहूँगा की ऐसा आप सोचते है, बड़े बाबू नहीं ) और अगर जबान लम्बी और टिकाऊ होगी तो अपने से ऊपर वालो के _ _ _ _ (रिक्त स्थान अपने विवेक से भर ले ) चाटने के अलावा अपने "लम्बे और अच्छे अनुभव" की दास्तान (धीरे से इसे डींगे हांकना पढ़े) सुनाने के काम आती है।दास्तान बोले तो अपनी पिछली पोस्टिंग या प्रोजेक्ट के बहादुरी, पराक्रम, कर्तव्यपरायणता  और हुनर की किस्से। याने की जंगल में मोर नाचा, किसने देखा वाली बात।

केवल इन दो गुणों(लम्बा कार्यकाल और जबान) की बदौलत इंसान कितना ऊपर जा सकता है यह बात समझने के लिए आपको न्यूटन या आईन्स्टाईन होने की आवश्यकता तो है नहीं। समझ गए न ?

यह तो बात हुयी गुणों की तो भईया जहाँ सुख है वहां दुःख है, जहाँ हँसी है वहाँ रोना भी है और जहाँ दिन है वहां रात है ऐसे ही जहाँ गुण है वहाँ अवगुण भी होंगे ही। सोचिये भला की बड़े बाबुओं में क्या क्या अवगुण होते होंगे ?नहीं नहीं ऐसे महापुरुषों में कोई भी अवगुण भला कैसे हो सकता है ये तो सिर्फ गुणों और सद्गुणों की खदान होते है।

चलिए हम उलटे क्रम (Chronological order) में बातें करते है अपने बड़े बाबुओ के Extra ordinary सद्गुणों  की और इन्ही सद्गुणों के महत्ता और ऐसे बाबुओ की उपलब्धता के आधार पर उनकी वरीयता भी इसी क्रम में रखते चले जायेंगे ।

४ . भुक्कड़ बाबू :


कुछ बड़े बाबू जो होते है न उनके दिमाग में सिर्फ खाना-पीना रहता है। ऐसे बाबू सुबह दफ्तर आते ही काम से पहले चाय पकौड़े निपटाएंगे।  दोपहर में खुद के डिब्बे  के साथ साथ औरो के डिब्बो को भी चट कर जायेंगे। और फिर शाम की चाय के साथ समोसे और कचोरी अलग। इनमे एक विशेष खूबी होती है, कहीं भी प्लास्टिक की थैली की चर -चर  की आवाज़ सुनते ही पहुंच जायेंगे इसी आस में की कुछ खाने का खुला है। यही नहीं अगर गलती से किसी का खाने का डिब्बा लीक हो रहा हो तो खुशबू से जान लेंगे की आज कोई बिरियानी लेके आया है। रात होते ही पीने की बातें और बातों के साथ यह कवायद भी शुरू कर देंगे की कहीं फ्री की पीने को मिल जाये तो जन्नत नसीब हो । ऐसे गुणों के स्वामी बड़े बाबू आपको बहुतायत में मिलेंगे इसीलिए  जनरल कैटगरी के ऐसे महान लोगो को अपने क्रम में अंतिम स्थान पर रखा है।

३ . ठरकी बाबू :

कौन आदमी ठरकी नहीं होता जनाब, जब संसद में बैठा सफेदपोश नेता भी अपने फ़ोन पे "उस टाइप" के वीडिओज़ देखता पाया जाता है तो बड़े बाबू तो फिर भी एक मामूली से दफ्तर में बैठे बाबू है। ठरकी हो सकते है।इस पूरी दुनिया में आदमी ही एक ऐसा प्राणी है जिसकी ठरक उम्र, ओहदे और पैसे के साथ बढ़ती ही जाती है। बड़े बाबू इस बीमारी से कैसे अछूते रह सकते है। जैसे कुछ बड़े बाबुओ के दिमाग पर खाना-पीना हावी रहता है उसी प्रकार कुछ लोगो के दिमाग पर सिर्फ लड़कियां ही हावी रहती है। ऐसे बड़े बाबुओ को अगर फिरंगी लड़कियों (औरतें भी) से रू-बरु करवा दो तो इनके दिमाग के कोने कोने में ऐसे रस का स्त्राव शुरू हो जाता है जो इनके इमोशन्स को बेकाबू करने की जी-तोड़ कोशिश करता है। इस सारी मानसिक जद्दोजहद के अंत में बड़े बाबू अपने छोटे बाबू को सिर्फ इतना कह पाते है की "बस यार जैसे तैसे कंट्रोल करता हूँ, नहीं तो मन तो करता है की............ " हालांकि कुछ बड़े बाबू इस जद्दोजहद में हार जाते है और अपने इमोशन के हाथो अपनी इज्जत भी गँवा बैठते है।  ऐसे चरित्रवान बाबू बहुतायत में न मिले किन्तु दुर्लभ भी नहीं है। इसीलिए हमारी लिस्ट में तीसरे स्थान पर है।

२ . आवारा-नाकारा बाबू : ( ज़ोम्बी बाबू )

यह वह श्रेणी है जिसके अंतर्गत आने का नसीब हर किसी का नहीं होता। मतलब एक तो आपको बड़े बाबू के पद से नवाजा जाये, और ऊपर से कुछ काम धाम न करने पर भी कोई कार्रवाई न हो। ऐसे तक़दीरवाले बड़े बाबू जिस भी दफ्तर, कॉर्पोरेट में होते है वहां इनकी चर्चाएं भी खूब होती है। इन्हे अगर आम जनता के साथ बैठने को कहा जाये तो बिदक जाते है , पर्सनल केबिन जरूरी होता है। इस कैटगरी के लोग कभी कोई काम ठीक से कर नहीं पाते और हमेशा शिकार की तलाश में रहते है जो इनका काम कर दे और इनके बदले की गालियां भी सुन ले। इन्हे कुछ लोग ज़ोम्बी बाबू भी कहते है क्योंकि ये कुछ प्रोडक्टिव काम तो नहीं करते अपितु इधर उधर भटकते रहते है और दुसरो के कामो में उंगली करते है। ऐसे बड़े बाबू हमारी लिस्ट में दूसरी वरीयता पर आते है।

१. सर्वगुण संपन्न बड़े बाबू :

हमारी लिस्ट के सर्वोच्च पायदान पर है वो बड़े बाबू जिनमे उपरोक्त सभी गुण प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होते है। इतना ही नहीं इन सभी गुणों के अलावा इनमे और भी कईं ख़ास बातें होती है जैसे चिन्दिगिरी(अपनी चाय के पैसे दुसरो से दिलवाना), आलसीपन(दफ्तर में सोते रहना), फटीचरी (पैसा कमाते हुए भी दिखाना भी इनसे गरीब कोई नहीं )इत्यादि। ऐसे छोटे मोटे गुणों का बखान तो हम कर ही नहीं रहे है। इतनी सारी विशेष कलाओं के धनि हमारी इस लिस्ट में प्रथम स्थान पर विराजमान है।

 किन्तु इस प्रजाति के बड़े बाबू सर्वगुण संपन्न बहु की भांति ही दुर्लभ है, किसी किसी बदनसीब के दफ्तर में ही मिलते है। पर जिसे भी मिलते है वो अगर इन्हे हँसते हँसते सह जाये, इनके साथ रहकर अपने सारे काम सकुशलता से निपटाता जाये तो उसे वीरता पुरूस्कार से नवाज़ा जाता है।

 इन सभी प्रकार के बड़े बाबुओ के बीच कुछ अपवाद भी पाये जाते है। यह अपवाद बड़ी लगन और श्रद्धा से, मेहनत और जूनून से अपना काम करते है। ऐसे बड़े बाबुओ को भी प्रणाम।

हमारे देश के सरकारी - प्राइवेट बड़े बाबुओ की यह चर्चा अब यहीं समाप्त करते है, फिर मिलेंगे अगले मसालेदार लेख के साथ। और हाँ आप भी अगर बड़े बाबू बनो तो हो सके तो मेरी उपरोक्त बातो को झूठा जरूर साबित करना।

एक मिनट  ..........
"क्या कहा आपने ? , IT  इंडस्ट्री मैं ?" अरे जनाब बिलकुल, यहाँ तो ऐसे बड़े बाबुओ की भरमार है। किसी भी प्रोजेक्ट में जाईये असल काम करने वाले सिर्फ २ या ३ मिलेंगे परन्तु उनके ऊपर ६-८  बड़े बाबू बैठे मिल जायेंगे। गौर से अपने आसपास देखिये और लेख फिर से पढ़िए, क्या पता आपके बाजु में ही कोई बड़ा बाबू बैठा हो।


सभी चित्र गूगल बाबू की कृपा से