Tuesday, 12 April 2016

तलाश - जीवन यात्रा

अँधेरी कोठरी में ढूँढता  हूँ एक दीपक उजाले के लिए 
जैसे भटका हुआ परिंदा ढूंढे कोई दरख़्त सुस्ताने के लिए 

चेहरो की इस भीड़ में तलाशता हूँ एक चेहरा जिसे कह सकु मैं अपना 
जैसे हर सुबह उठके याद करे कोई एक भुला हुआ सा सपना 

असंख्य दर्पणों में खोजता हूँ खुद की एक तस्वीर धुँधली सी 
जैसे हजारो बार किसी से मिलने पर भी उसकी हर मुलाक़ात लगे पहली सी 

कहने को तो जी रहा हूँ मैं, पर अभी भी तलाश है ज़िन्दगी की 
ऊपर वाला भी राह दिखाए तो कैसे, उसे भी तो खोज है सच्ची बंदगी की 

कुल मिलाकर बस बात इतनी सी है की 

ढूंढ रहा हूँ मैं अपनी आत्मा, जो खो गयी है कहीं मेरे ही भीतर 
जैसे तेज़ बहती नदी थक हार कर तलाशती है अपना समंदर 

यह जीवन एक यात्रा है अनन्त खोज की, जिसमे न जाने क्या ढूंढ रहा है हर कोई और इसी खोज में खो दे रहा है स्वयं को कहीं।


Sunday, 26 July 2015

बंधन



डिस्क्लेमर/घोषणा/सावधान:
यह पोस्ट थोड़ी गंभीर हो सकती है, हो सकता है की इसमें हास्य का तड़का फीका रहे, यह भी हो सकता है की अंत तक थोड़ी भारी भारी सी लगने लगे; किन्तु विश्वास कीजिये इसे पूरा पढ़ने के बाद आप निस्संदेह प्रसन्नचित्त होंगे।

जैसा की शीर्षक से समझ आता है की यह लेख किसी प्रकार के बंधन या सम्बन्ध पर आधारित है। जी हाँ सबसे महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध या नाता जिसे मानवता का नाता कहते है उसी पर आधारित है यह लेख। इस संसार में हर एक मनुष्य दूसरे मनुष्य से किसी न किसी तरह जुड़ा हुआ है। भले ही आपस में कोई स्पष्ट सम्बन्ध दिखाई न दे किन्तु हमारा जीवन हर पल किसी न किसी के जीवन को प्रभावित करता है। अगर सिंपल भाषा में बात करू तो हम सब एक दूसरे से किसी न किसी तरह कनेक्टेड है। सुनने में थोड़ा अजीब लगे किन्तु हम इस तरह से जुड़े हुए है की किसी एक इंसान का दर्द हमे तकलीफ दे सकता है और किसी दूसरे कोने में दूसरे इंसान की एक मुस्कान हम सभी को ख़ुशी दे सकती है। और इस बात से आप इंकार नहीं कर सकते की किसी अनजाने इंसान की तकलीफ देखकर आपको जरा भी रंज नहीं होता या किसी मासूम बच्चे की हंसी देखकर आपको जरा भी ख़ुशी का अहसास नहीं होता। निस्संदेह होता ही होगा।

कहने का तात्पर्य यह है की जिस प्रकार किसी और का दुःख हमें दुखी कर सकता है, किसी और की ख़ुशी हमें खुश कर सकती है उसी प्रकार हमारा दुःख भी किसी और को दुखी करने के लिए पर्याप्त है। हम बचपन से ही सुनते-पढ़ते आ रहे है की जैसा बोओगे वैसा काटोगे, जैसी करनी वैसी भरणी या अंग्रेजी में Whatever goes around, comes around. यह चीज हमारे वचन और कर्म पर लागू होती है। हमारे द्वारा बोला गया कटु वचन जो भले ही हमने किसी अपने को बोला हो वो किसी और के जीवन को प्रभावित कर सकता है। इस चीज को समझने के लिए एक उदाहरण लेते है रामायण का, मुझे नहीं पता की आप में से कितनो को यह कहानी पता होगी। किन्तु इस बात को समझने के लिए बही इससे सटीक उदाहरण नहीं मिला।
आप जानते है अपनी पत्नी सीता को राम जी ने रावण के चंगुल से छुड़ाने के उपरांत पुनः परित्याग करते हुए जंगल में छोड़ दिया था। क्यों किया था ऐसा, जानते है आप ? दर-असल राम के राज्य में एक दिन एक शराबी धोबी नशे में धुत्त होकर अपनी पत्नी को सरे-राह पिट रहा था और भला बुरा कह रहा था। नशे में उसने कुछ ऐसे वचन कहे जिन्होंने इतिहास रच दिया। गुस्से और नशे के वश में उस धोबी ने अपनी पत्नी को गालियां देते हुए कहा :
"कुलटा है तू, निकल जा मेरे घर से, मैं राम के जैसा महान नहीं हूँ जो किसी और के पास रहकर आयी अपनी पत्नी को अपना ले। मैं तुझे त्यागता हूँ, मैं अधर्म नहीं कर सकता। एक दूषित नारी को अपने घर में जगह नहीं दे सकता। "

यह वचन इतने प्रभावी सिद्ध हुए की भगवान राम के दरबार तक जब यह बात पहुंची तो उनके पंडित पुरोहितो ने तुरंत उन्हें राजधर्म निभाने की सलाह देते हुए सीता का त्याग करने का आदेश दे दिया। और राम ने राजधर्म को परिवार से बड़ा मानते हुए सीता का त्याग कर दिया।

चित्र गूगल इमेज सर्च से
 
देखा आपने, एक शराबी ने नशे और गुस्से में आकर जो शब्द अपनी पत्नी को कहे वो शब्द सीता के जीवन पर भारी पड़े। कहने को तो एक मामूली सा  धोबी ही था वो जिसका राज-परिवार से कोई रिश्ता नहीं था परन्तु फिर भी वो सीता के जीवन में होने वाले उथल पुथल का कारण बना। इसी प्रकार से हमारे भी वचन अनजाने में पता नहीं किसके जीवन को नुकसान पंहुचा सकते है।इसलिए जो भी बोले सोच समझ कर बोले, कई बार कटु वचन हमारे मन में कुलबुलाते रहते है। ऐसे समय में चुप रहना ही न्यायसंगत होता है।

यह तो  हुयी हमारे द्वारा इस्तेमाल किये जाने वाले शब्दों की बात, इसी प्रकार से हमारे किये हुए कर्मो का असर सिर्फ हमारे जीवन पर ही नहीं होता अपितु समस्त संसार में किसी भी प्राणी के जीवन पर हो सकता है। इसको समझने के लिए हम समकालीन उदहारण लेते है।
मान लीजिये की आज आपने अपने ऑफिस में इतना अच्छा काम किया की शाम को देर तक बैठने की जरुरत नहीं पड़ी। आपका बॉस भी बड़ी ख़ुशी के साथ आज जल्दी घर निकल गया। जल्दी पंहुचा तो बॉस की बीवी बड़ी खुश हुयी और वो दोनों बड़े दिनों बाद बाहर डिनर पर जा सके। पत्नी इतनी खुश थी की बॉस को इस वीकेंड अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने की इजाज़त देदी। वेटर को भी आज ज्यादा टिप मिली। आते आते पड़ौसी के बच्चे के लिए आइसक्रीम खरीद के ले आये तो वो बच्चा भी खुश हो गया। बच्चे को खुश देखकर उसके माँ बाप भी बड़े आनंदित हुए। (आपके जल्दी घर पँहुचने पर जो खुशियाँ आपको मिली होगी उसका हिसाब तो यहाँ हम रख ही नहीं रहे है। )


तो देखा आपने, आपके द्वारा ऑफिस में किया हुआ अच्छा काम कितने लोगो को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर गया। इसी प्रकार से अगर हम वही काम बिगाड़ देते, जिसको सुधारने के लिए देर रात तक आपको और बॉस को ऑफिस में ही बैठना पड़ता तो यह चैन ऑफ़ इवेंट्स बिलकुल उलटे होते।

शायद विज्ञान की भाषा में इसे रिप्पल इफ़ेक्ट की उपाधि दी गयी है किन्तु यह बचपन से सुनते आ रहे उस जुमले का ही विज्ञानी नाम है जिसे हम कहते है Whatever goes around, comes around. या जैसा करोगे वैसा भरोगे।

कल्पना कीजिये की अगर पूरी दुनिया में लोग अपने वचनो और कर्मो से किसी को दुःखी न करे,तो हो सकता है की एक दिन समस्त संसार से दुःखो का नाश हो जाये। हमारे अच्छे वचन और अच्छे कर्म हमे ही नहीं अपितु पुरे संसार को सुख देने की क्षमता रखते है।

अगर हम इस समाज के भले के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सकते तो कम से कम इतना तो कर ही सकते है की निश्चय करले की कटु शब्दों और घृणा से भरे वचनो का प्रयोग करने से बचेंगे और प्रयत्न करेंगे की कभी हमारे शब्द या कर्मो से किसी को कष्ट न पहुंचे।

ध्यान रखने वाली बात यह भी है की यह कर्म और वचन ऑनलाइन क्रीड़ाओं पर ज्यादा लागू होता है , क्योंकि आजकल प्रत्यक्ष जीवन में तो इतना हम किसी से मिलते जुलते नहीं जितनी बाते सोशल मिडिया पर करते है।
कोशिश करे की किसी घृणा से भरी पोस्ट को आगे बढ़ने से रोके और खुद तो ऐसे पोस्ट कदापि न डाले।

अगर अच्छी लगे तो इस पोस्ट को आप जरूर आगे बढ़ा सकते है शेयर का बटन दबा के।


नोट : ऊपर कही गयी बातों को अंग्रेजी में विज्ञान के लहजे में समझने के लिए Google सर्च करे "Ripple Effect" और "Butterfly effect".









Sunday, 21 June 2015

Piclog-4

Though I am not a pro, however now a days who has a phone camera is a photographer :)

After my previous piclogs, here I am with Piclog-4


I know each and everything around us inspire us to do something better in our life. If you observe closely around yourself, you will find that everything has a philosophical point of view.

I am inspired very much from a train. Our life is smiler to a train where after each certain period it halts for a station. Some people leave it and some get on-boarded. It never mind for those who leave it, nor it rejects anybody who try to on-board it.

A train-a life (Picture taken at Matheran-Toy train)



A train may be like our life, but this runs on rail tracks. Again our life evolves on rail tracks, 2 paralleled iron bars, people call them parents. These 2 parallel bars are together always just to give a direction to our life. Irrespective of weather, climate and our speed to reach destination, these bars always support us/train.

Backbone of a train, like our parents are backbone of our life



Note: Pictures taken by my phone camera.

Monday, 20 April 2015

बिरियानी

मुझे पता है की कईयों की तो लार टपक पड़ी होगी इस लेख का शीर्षक पढ़ के। हिंदुस्तान में रहो और बिरियानी से प्यार न करो ऐसा कैसे हो सकता है। लखनऊ से लेकर हैदराबाद तक, कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक बिरियानी की महक आपको अपनी और खींच लाएगी।

बिरियानी के चर्चे गली मोहल्ले तो छोड़िये आजकल फिल्मो में भी बहुत होने लगे है। वैसे तो बिरियानी मूल रूप से कभी शाकाहारी व्यंजन रहा ही नहीं किन्तु आजकल वेज-बिरियानी भी उतनी ही शिद्दत से बनायी और खायी जाती है जितना की कभी राजा महाराजा मटन बिरियानी खाया करते थे।
दूसरे व्यंजन तो आपको देखने पर ललचायेंगे किन्तु बिरियानी के प्रति आपका प्यार ऐसा है की बिना देखे दूर से ही अगर कही से महक आ जाये तो आपके पेट में हँसी और मुँह में पानी आ जायेगा। वैसे दम बिरियानी का दम निकाल दो तो वो बन जाता है पुलाओ, बिरियानी का ही भाई है। यह भी कहीं कम नहीं पड़ता सैकड़ो प्रकार से बनाया जाता है। पीस पुलाओ, कश्मीरी पुलाओ, बंगाली पुलाओ तो कहीं शाही पुलाओ के नाम से यह भी अपना रंग जमा ही लेता है।

अपने देश का कोई भी प्रदेश हो और किसी भी धर्म, जाती का समारोह हो बिरियानी और पुलाओ हमारी दावतों का अभिन्न अंग है। में खुद ४ साल हैदराबाद में रहा हूँ तो बिरियानी से तो अपना घर जैसा सम्बन्ध हो गया है। यह बात और है की शुद्ध शाकाहारी होने के नाते मेरी प्लेट में आने का सौभाग्य अब तक सिर्फ वेज बिरियानी को ही मिला है। किन्तु कसम संजीव कपूर और मास्टर शेफ की, शाकाहारी बिरियानी में भी जो मजा है न वो शायद हड्डियों वाली में न हो। खैर छोड़िये, बात बिरियानी की हो रही थी, तो उसी पर रहते है , इंसानो की तरह उसका क्लासिफिकेशन नहीं करना चाहिए।

बिरयानी एक ऐसी चीज है जो खुद अपने दम पर जितनी प्रसिद्द हुयी है उससे ज्यादा तो अजमल कसाब ने उसको नाम दिलाया है। दुनियाभर में कसाब की बिरियानी के चर्चे हुए और अगर यह सच है उसे जेल में बिरियानी मिलती थी तो सोचिये की कितनी ताकत है इस बिरियानी में।  एक आतंकवादी के सारे जुर्म कबूल करवा लाई।

आप ऐसा मत सोचियेगा की मैं भूखा नंगा बैठा हूँ और सुबह से खाने को कुछ मिला नहीं इसीलिए फालतू की चीजे लिखे जा रहा हूँ।  दर-असल आज बीवी ने वेजिटेबल दम बिरियानी बनाई थी और जब मैं खाने बैठा तो मसालों की महक से ही आह हा हा , लार टपक सी गयी। फिर जैसे ही पहला निवाला खाया तो पेट को उस अद्भुत आनंद की प्राप्ति हुयी जिसके लिए साधु संत तपस्या करते फिरते है।
किन्तु फिर मेरे दिमाग में आया की बेचारे चावल, सब्जियां और मसाले कितने कष्ट सहते है हमारी तृष्णा शांत करने के लिए। खौलते पानी में इन्हे उबाला जाता है और गरम तेल में तड़का लगाया जाता है उसके बाद परत दर परत एक के ऊपर एक इन्हे बिछा के दम घुटने तक पकाया जाता है। तब जाके तैयार होती है लजीज बिरियानी।

कितनी तपस्या, त्याग और कष्ट झेलती है यह बिरियानी, ऐसा सोचते सोचते मैं जैसे ही दूसरा निवाला उठाने लगा तो एक चावल छिटक के बोला।

"खाले हपशी खाले इतना मत सोच, हम तो बने ही इस लिए है, की हमें पका के तुम खाओ। "

 तभी गोभी का टुकड़ा भी मचल के बोला,

"हाँ हाँ हम इतना सब कुछ तुम्हारे लिए ही तो सहते है। कहाँ कहाँ से हमें लाया जाता है , काटा जाता है पकाया जाता है सिर्फ इसलिए की तुम्हारा पेट भर सके और तुम खुश रहो।"

 फिर दूसरा चावल बोला ,

"तुम इंसान तो एक साथ  एक देश, एक शहर और एक मोहल्ले तो क्या एक घर में शांति से नहीं रह सकते। हमेशा लड़ते झगड़ते हो, कभी जाती के नाम पर तो कभी धरम के नाम पर। कभी अमीरी के नाम पर तो कभी गरीबी के नाम पर। तुम लोग खुद के सिवा दुसरो का भला क्या ही सोचोगे। हमें देखो देश के अलग अलग कोने  से आये और अलग अलग जाती धरम के लोगो द्वारा हमें लाया गया है।हम चावल एक गरीब हिन्दू किसान के खेत से आये है, यह आलू एक दलित के हाथो उखाड़े गए थे और यह जो केसर डाला है न बिरियानी में वो एक मुस्लिम ने उगाया था फिर भी हम एक साथ मिलकर इतनी लजीज बिरियानी बन गए।  हम सब मिलकर, एक साथ एक बर्तन में एक ही आंच पर पक कर तुम जैसे कितने ही इंसानो का पेट और मन भरते है । हमें हर मजहब, जाती और वर्ग का इंसान उतने ही प्यार से खाता है जितने प्यार से हमे उगाया और पकाया गया। "

फिर पूरी की पूरी बिरियानी एक सूर में बोल पड़ी

"तुम इंसानो को भी ईश्वर ने बड़े प्यार से बना के भेजा है एक दूसरे का प्यार पाने के लिए, एक दूसरे की हिम्मत और सहारा बनने के लिए। किन्तु तुम लोग............. छोड़ भाई तू रहने दे यह सब, मत सोच इतना, खाले तू आराम से।"







Thursday, 11 September 2014

अजन्मे का संकट


आज बड़े दिनों बाद ऐसा हुआ की में सूरज ढलने  से पहले ही ऑफिस का  काम निपटा के घर पहुँच गया। मुझे समय से पहले ही दरवाज़े पर खड़ा पाके मेरी बीवी बड़ी खुश हुयी।  जी साब हम आईटी वालो के जीवन का घडी से कोई लेना देना नहीं होता, कब उठे, कब तैयार हुए, कब ऑफिस पहुँचे और फिर कब घर लौटे, इन सब का समय से कोई वास्ता है ही नहीं ।

पत्नी के मुखमंडल पर मिश्रित सी भावभंगिमा देखकर मुझे आश्चर्य नहीं हुआ, परन्तु वो बड़ी खुश हो गयी।
पत्नियां भी अजीब होती है ( सभी को पता है , कोई नयी बात नहीं ) कभी कभी कोई बड़े से बड़ा काम भी करो या कोई बड़े से बड़ा उपहार भी लाके दो तब भी खुश नहीं होती, और कभी छोटी छोटी सी बातों में ही खुश हो जाती है , जैसे की अभी मुझे समय से पहले अपने सामने पाकर मेरी पत्नी खुश हुयी।

जल्दी से हाथ मुह धोकर मैंने आज बहुत दिनों के बाद शाम की(भी) चाय अपने हाथो से बनाकर अपनी अर्धांगिनी के साथ में बैठकर चुस्कियां मार मार के पी। चूँकि अभी शाम का समय था, बाहर का मौसम भी थोड़ा रोमेंटिक सा हो चला था, सो हमने सोचा क्यों का आज कॉलोनी के बड़े वाले गार्डन में "इवनिंग वॉक " पर चला जाये।  झटपट से तैयार होके हम निकल पड़े।

गार्डन में पहुंच के बड़ा अच्छा लगा, बड़े से गार्डन में  अलग अलग कोने में और बहुत सारे  और हर उम्र के बच्चे खेल रहे थे, दूसरी और कुछ बुजुर्ग अपना प्राणायाम कर रहे थे, एक कोने में कुछ महिलाएं निंदासन कर रही थी।  निंदासन क्या होता है यह तो आपको पता ही होगा।
गार्डन में हम लोग थोड़ा चहल-कदमी करते रहे , में आसपास के यह सारे नज़ारे देखता-सुनता रहा और साथ ही साथ बैकग्राऊँड में मेरी बीवी के  मुख कमलो से निकली वाणी मेरे कानो में बराबर पड़ती रही और में हूँ -हूँ करता रहा।

 कुछ देर चहल कदमी करने के पश्चात् हम लोग मौका देख कर एक खाली बेंच पर विराजमान हुए और मैंने अपनी हूँ- हूँ जारी रखी।  मेरे कानो पर तभी कुछ बुदबुदाने की ध्वनि पड़ी, पास वाली बेंच से ही यह ध्वनि आ रही थी, दर-असल 2 महिलाएं कुछ बातें कर रही थी, एक महिला गर्भवती जान पड़ती थी , और इस बार हमने अपनी पत्नी से आज्ञा लेके  उन दोनों  के संवाद को अपने कानो के ज़रिये दिमाग में रिकॉर्ड कर डाला। और अब वही संवाद सीधा यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। सहूलियत के लिए मेने दोनों नायिकाओं को नाम दिए है उमा और रमा। जिसमे से रमा वो है जो कुछ दिनों में इस धरती पर नया जीवन लाने वाली है , जी हाँ मतलब गर्भवती है।

उमा : अरे रमा तू वो पाउडर ले रही है की नहीं ? जो मेने तुझे दिया था , वो पाउडर खायेगी तो बच्चा  गोरा चिट्टा और तंदुरुस्त पैदा होगा।
रमा : हाँ हाँ दीदी ले रही हूँ न , दिन में ३ बार लेती हूँ वो तो।

उमा : और तू ना सारे रियल्टी शो देखा कर, जिस से तेरा बालक भी टेलेंटेड पैदा होगा , आजकल सब बच्चे ऐसे ही पैदा होते है, पैदाईशी टैलेंटेड।
रमा: अरे हाँ, आप सही कह रहे हो , वो पास वाली बिल्डिंग में मोना को बेटी हुयी ना तो वो सूर के साथ ही रोती है , और लेटे  लेटे ही डांस भी करती है।  उस मोना ने जरूर सारे रियल्टी शो देखे होंगे, मैं भी सारे शो देखा करुँगी, मुझे भी अपने बच्चे को सुपर टैलेंटेड बनाना है।

उमा: और सुन, तेरे पति जब क्रिकेट देखे ना तो वो तू भी देखा कर, आजकल के बच्चे स्पोर्ट्स में भी आगे होते है, तुझे भी अपने बच्चे को   . . . . . . . . .
रमा: अरे दीदी , यह सब में पूरा ध्यान रखती  हूँ,पर इसके चक्कर में मेरे कई सीरियल्स मिस हो जाते है , पर क्या करे बाहर कॉम्पिटिशन इतना बढ़ गया है की मुझे अपने बच्चे के लिए यह सब करना पड़ता है।

इन महिलाओ की यह चर्चा यहीं समाप्त नहीं हुयी थी, की अचानक से मेरे कानो में एक नन्ही आवाज़ गूंजी, बचाओ बचाओ करके . . ..... सीधे रमा के गर्भ से, जी हाँ , इन दोनों की इतनी भयानक प्लानिंग सुन के बेचारा बच्चा चीख पड़ा , की बस करो, मेरे बाहर आने से पहले ही मुझ पर इतना प्रेशर डाल रहे हो तो  बाहर आने के बाद मेरा क्या हाल करोगे।




इतनी बातें सुन कर , में भी सोच में पड़ गया की बीते कुछ वर्षो में हमारे बालको पर माता पिता द्वारा उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के लिए इतना दबाव डाला जा रहा है जिसके लिए कहते सुनते सब नजर आते है , परन्तु करता कोई कुछ नहीं। वैसे माता पिता भी इसी दबाव में रहते होंगे की कही उनका बच्चा बाकी बच्चो से किसी विधा में पिछड़ न जाये। परन्तु  इस होड़ में आज के बालको का बालपन कहीं नजर नहीं आता।

आप भी सोचियेगा , की कही यही "कम्पीटीशन " बच्चो को समय से पहले "बड़ा" तो नहीं कर रहा ?
मेरा इशारा तो आप समझ ही रहे होंगे।

में घड़ा हूँ कच्चा, पकने में समय लगने दो  
बड़ा होने की जल्दी नहीं है मुझे  
बच्चा हूँ अभी मैं, मुझे बच्चा रहने दो। । 



नोट : बच्चा और बालक शब्द पढ़ने सुनने में पु:लिंग लगते है , परन्तु हिंदी भाषा में यह शब्द उभयलिंगी (यूनिसेक्स) है। तो कृपया लेख के मूल से भटकने का प्रयास न करे !
चित्र इंटरनेट के सौजन्य से








Tuesday, 18 March 2014

शादी के बाद तुम बदल गए -२

शादी के बाद तुम बदल गए, इस जुमले पर एक बहुत ही हल्का सा ऑब्जरवेशन मेने अपने पुराने लेख में लिखा था, जो आपने पसंद किया था।

इसी कड़ी में "शादी के बाद तुम बदल गए" का दूसरा संस्करण आपके समक्ष प्रस्तुत है, यह लेख मूलतः मेरा लिखा गया नहीं है, और मूल लेखक का मुझे अता -पता भी नहीं है, मेने तो बस "रेडी तो ईट मील " में थोडा तड़का लगाने का प्रयास किया है, आशा है आपको पसंद आएगा। 


शादी के बाद हर इंसान बदलता है यह बात तो आपको समझ में आ ही गयी होगी, लोग आपके लिए बदल जायेंगे, आप लोगो के लिए बदल जायेंगे, यही नहीं आप अपनी बीवी या पति के लिए भी बदल जाओगे शादी के बाद, हम तो इंसान है बदलना हमारा स्वाभाव है लेकिन भगवान् का क्या ? 

अब आपको लेके चलता हूँ ऐसी ही एक मजेदार चर्चा में जहा आपको पता पड़ेगा कि शादी के बाद भगवान् भी कितना बदल गए, जी हाँ, यह चर्चा हो रही है स्वर्ग में भगवान् श्री कृष्ण और राधा रानी के बिच.

ऐसे ही घूमते घामते कृष्ण एकदम से राधा जी से टकरा गए एक दिन, देखते ही चोंक से गए, अब चौंकना तो स्वाभाविक है, आपकी शादी के हजारो साल बाद आप किसी दिन अपनी एक्स-प्रेमिका से टकरा जाओ तो आदमी शॉक में आ ही जायेगा, परन्तु यहाँ कृष्ण जी दिल ही दिल में खुश हुए और चौंकने का थोडा नाटक किया, खुश इसलिए हुए क्योंकि रुक्मिणी उनके साथ नहीं थी। कृष्ण कुछ कहते इसके पहले ही राधा जी बोली कैसे हो द्वारकाधीश ?


अब आप ही सोचिये अगर आप सालो बाद अपनी एक्स प्रेमिका से मिलो और वो आपको आपके ऑफिस में जो आपका पद है उससे सम्बोधित करे, मसलन कहे कि "कैसे हो मेनेजर साब ?" कैसा लगेगा आपको, जो कभी आपको आपके उपनाम से पुकारा करती थी, स्वीटहार्ट , जान , जानु इत्यादि और अचानक मेनेजर साब ?

यही हुआ भगवान् कृष्ण के साथ ,जो राधा उन्हें कान्हा कान्हा कह के बुलाती थी उसके मुख से द्वारकाधीश का संबोधन कृष्ण को भीतर तक घायल कर गया फिर भी किसी तरह अपने आप को संभाल लिया और बोले राधा से .........
मै तो तुम्हारे लिए आज भी कान्हा हूँ तुम तो द्वारकाधीश मत कहो! आओ बैठते है ....जलपान ग्रहण करते है कुछ मै अपनी कहता हूँ कुछ तुम अपनी कहो, और वो लोग जाके एक पेड़ कि छाँव में बैठ गए, अगर आप अपने जीवन से जोड़ के देखना चाहे तो जैसे आप किसी मॉल में "उनसे" मिले और कॉफी के लिए बैठ गए। 
सच कहूँ राधा जब जब भी तुम्हारी याद आती थी इन आँखों से आँसुओं की बुँदे निकल आती थी, दिल बड़ा ही बेचैन हो उठता था, लेकिन क्या करे शादी का धर्म रुक्मिणी के साथ निभाना ही था.
राधा ने भी एक जमके फ़िल्मी फटका मारा और  बोली,
मेरे साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ ना तुम्हारी याद आई ना कोई आंसू बहा क्यूंकि हम तुम्हे कभी भूले ही कहाँ थे जो तुम याद आते, इन आँखों में सदा तुम रहते थे कहीं आँसुओं के साथ निकल ना जाओ इसलिए रोते भी नहीं थे, हम तो वैसे के वैसे ही है,  ज़रा सा भी नहीं बदले, आप ही बिलकुल बदल गए शादी के बाद.
कृष्णा अपने माथे पे हाथ रख के  बोले , 
अरे राधा तुम भी ?? सारी  दुनिया कहती है में शादी के बाद बदल गया, यंहा तक कि रुक्मिणी भी यही कहती है , तुम तो ऐसा मत कहो। 
बेचारे कृष्ण भी एकदम फ्रस्ट्रेट होके  बोले थे , लेकिन राधा तो राधा थी, एक तो लड़की और ऊपर से एक्स प्रेमिका, 
राधा बोली, नहीं द्वारकाधीश, 
तुम बहुत बदल गए हो, मानो या न मानो, तुम मेरे कान्हा नहीं रहे.आप  कितना बदल गए हो इसका इक आइना दिखाऊं आपको ? कुछ कडवे सच ,प्रश्न सुन पाओ तो सुनाऊ?
कृष्णा जी कुछ और कहते इसके पहले राधा जी ने टोका और आगे कहना शुरू किया, वैसे भी एक बार नारी कहना शुरू कर दे तो नर को चुप चाप खड़े रह के सुनना ही पड़ता है , बिलकुल डॉक्टर कि कड़वी दवाई कि तरह  हर बात निगलना पड़ती है
राधा ने कहना जरी रखा ,  
कभी सोचा इस तरक्की में तुम कितने पिछड़ गए यमुना के मीठे पानी से जिंदगी शुरू की और समुन्द्र के खारे पानी तक पहुच गए ?एक ऊँगली पर चलने वाले सुदर्शन चक्रपर भरोसा कर लिया और दसों उँगलियों पर चलने वाळी बांसुरी को भूल गए ? कान्हा जब तुम प्रेम से जुड़े थे तो ....जो ऊँगली गोवर्धन पर्वत उठाकर लोगों को विनाश से बचाती थी प्रेम से अलग होने पर वही ऊँगली क्या क्या रंग दिखाने लगी सुदर्शन चक्र उठाकर विनाश के काम आने लगी.

तुम कहते हो कि तुम नहीं बदले लेकिन कान्हा और द्वारकाधीश में क्या फर्क होता है बताऊँ, कान्हा होते तो तुम सुदामा के घर जाते सुदामा तुम्हारे घर नहीं आता, तुम राजा हो गए हो, बड़े आदमी हो गए हो, तब एक ग्वाले हुआ करते थे। 
अब तक राधा फुल मूड में आ चुकी थी, कान्हा भी समझ गए थे कि अब पार पाना अपने बस का ना है

राधा ने बिना साँस लिए बोलना ज़ारी रखा 
युद्ध में और प्रेम में यही तो फर्क होता है युद्ध में आप मिटाकर जीतते हैं और प्रेम में आप मिटकर जीतते हैं कान्हा,  प्रेम में डूबा हुआ आदमी दुखी तो रह सकता है पर किसी को दुःख नहीं देता

राधा वाकई में कान्हा कि सच्ची प्रेमिका थी, कान्हा कि हर गतिविधि पर नजर रखे हुए थी, कान्हा के हर एक एक्शन को राधा ने करीब से देखा था, हो सकता जैसे आप भी अपने एक्स पार्टनर कि फेसबुक प्रोफाइल को रेगुलरली चेक करते हो, मन ही मन उसके हर मूव को रिकॉर्ड करते हो, हो सकता है न ? मतलब में ये नहीं कह रहा कि ऐसा होता ही है, हो सकता है, सम्भावना है। 
तो राधा को भी कान्हा कि पूरी जानकारी थी, उसने आज सोच लिया था कि साबित करना ही है कि कान्हा शादी के बाद कितना बदल गया है , राधा आगे बोली 
आप तो कई कलाओं के स्वामी हो स्वप्न दूर द्रष्टा हो गीता जैसे ग्रन्थ के दाता हो पर आपने क्या निर्णय किया अपनी पूरी सेना कौरवों को सौंप दी? और अपने आपको पांडवों के साथ कर लिया सेना तो आपकी प्रजा थी राजा तो पालक होता है उसका रक्षक होता है, आप जैसा महा ज्ञानी उस रथ को चला रहा था जिस पर बैठा अर्जुन आपकी प्रजा को ही मार रहा था अपनी प्रजा को मरते देख आपमें करूणा नहीं जगी ?
 क्यूंकि आप प्रेम से शून्य हो चुके थे, आप बदल चुके थे मान लो कान्हा कि इंसान हो या भगवान्, शादी के बाद हर कोई बदल जाता है। 
कान्हा कि बारी आयी, अबकी कान्हा बोले, 
मान गया राधा कि में बहुत बदल गया हूँ, लेकिंन क्या करे काम काज का बोझ, और शादी के बाद घर गृहस्थी कि जिम्मेदारी में कोई भी अपने आप को बदल ही लेता है, बदलना ही पड़ता है, जिंदगी में आगे बढ़ना ही पड़ता है, अब इसमें मेरा क्या कसूर ?
राधा ठहाके लगा के हंसी और बोली, वो तो सब ठीक है, पर एक बात बताती हूँ, प्रेम से कभी दूर मत रहो, हो सके तो उसी से शादी करो  जिससे प्रेम करते हो, वोही काम करो जिसमे आनंद आता हो, बस जिम्मेदारी निभाने के लिए किया गया काम और प्रेम ये दुनिया याद नहीं रखती।
कान्हा ने माथे पे बल देकर कहा, में कुछ समझा नहीं राधा, 
तब राधा ने अपना लास्ट बट नोट दी लीस्ट वाला मास्टर डायलॉग मारा, और जो बात राधा ने कही उसके बाद आप भी विचार करने को मजबूर हो जायेंगे ……………राधा ने अपनी अंतिम बात कुछ यू रखी
मतलब यह है कान्हा कि आज भी धरती पर जाकर देखो अपनी द्वारकाधीश वाळी छवि को ढूंढते रह जाओगे,  हर मंदिर में मेरे साथ ही खड़े नजर आओगे आज भी मै मानती हूँ लोग गीता के ज्ञान की बात करते हैं उनके महत्व की बात करते है मगर धरती के लोग युद्ध वाले द्वारकाधीश पर नहीं प्रेम वाले कान्हा पर भरोसा करते हैं गीता में मेरा दूर दूर तक नाम भी नहीं है पर आज भी लोग उसके समापन पर " राधे राधे" करते है"

विचार कीजियेगा कि शादी के बाद बदल जाने के तर्क वितर्क में भगवान् भी जीत न पाये तो क्या आप जीत पाएंगे ??

Friday, 29 November 2013

सौदागर

सौदागर , यह कविता एक कल्पना नहीं है आज के समाज का सच्चा रूप है, हमारे इर्द-गिर्द कितने ही सौदागर घूम रहे है जो हर पड़ाव पर हमारी आत्मा के सौदे के लिए हमें उकसाते है, लेकिन मानवता को जीवित् रखने हेतु हमें किसी कीमत पर अपनी आत्मा का सौदा नहीं करना है, बस यही विनती मात्र है यह कविता।



Wednesday, 23 October 2013

Hindi V/s English



I have not written too many posts on this blog, but whatever I have written mostly are in Hindi language. Recently I got a feedback from few of my friends who told me that they feel it difficult to read Hindi/देवनागरी  Scripts but they can speak and understand Hindi very well. It was not surprising for me because they were amongst the people whose throughout education carried out in English language, and they had an “Only English” atmosphere during their upbringing.


Today we have a large chunk of people who can speak and understand Hindi but they find it hard to read if anything is written in Hindi or in Devnagari script. Reading English novel is also a kind of fashion for today’s generation; I have seen many parents who talk to their children only in English and scold them if they utter a word in native language.
I don’t have any personal enmity with English Language; after all English language plays a big role to earn my bread and butter.

Pheww …. Now philosophy is enough, I come to the point why I do not write much in English? Answer is very simple; I do not know how to write in English. I feel myself helpless when it comes to express feelings.  For example if you want to abuse some one then will you use “F” word or use our treasure of words of Hindi? First question, why do we abuse someone, Kyonki gaali bakne ke siwa uska kuchh ukhaad nahi sakte, right? so to get best feel we always use Hindi swear words. Here my stress is on feelings and not on swear words, so do not be misguided I am talking about feelings only. When you meet your best friend after a long time will you talk to him like “hey dude, where you were for long? Whats up , uhhh? …. No you will not, if you are a real Indian, then you will say “ oye kameene, kahan tha yaar tu, gaayab hi ho gaya ssale”. Here have you noticed the FEEL?

Okay, let’s talk some romantic, here I can understand that those 3 English words are magical and can work, and you don’t need to use a single Hindi word for that, but if you love someone, then instead of saying “I love you”, say it in Hindi “mein tumse bahut pyar karta/karti hoon” and say it with a passionate eye contact, believe me not only you will get the feel but your partner will reciprocate it too.


So again I come to the point, why we can not read Hindi scripts if we can speak, understand and feel in Hindi?


With this post I would like to appeal all readers that Please read and give some time to Hindi as well, Hindi should not be taught in History subject.

नोट : यह पोस्ट हिंदी के प्रसार के लिए विशेष रूप से अंग्रेजी में लिखी गयी है , इस विरोधाबास के लिए क्षमा ॥ 
: Images from Internet

Tuesday, 10 September 2013

धर्मनिरपेक्ष कबाब



एक बार की बात है, 


एक हरी-भरी भिंडी मार्केट से गुजर रही थी,  तभी वहाँ पास ही के एक पोल्ट्री फार्म के कुछ मुर्गो  ने भिंडी को छेड़ दिया,  भिंडी घबराई, और डर के मारे वहां से भागती हुयी सब्जी मण्डी पहुची, उसको डरा हुआ देख के उसके  भाई आलू ने उससे पूरा हाल पूछा और जब उसे यह बात पता पड़ी की उसकी बहन को कुछ मुर्गो ने छेड़ा है तो आलू गुस्से से उबल पड़ा और अपने दोस्त प्याज़ को लेके गया पोल्ट्री फार्म.. ... वहां जाके उन दौनो ने मुर्गो को गालियाँ देना शुरू किया, मुर्गो को भी बड़ा गुस्सा आया, उन्होंने आलू और प्याज को घेर के खूब नोचा|

 बेचारे आलू और प्याज की हालत खराब हो  गई और यह खबर पूरी सब्जी मण्डी मे आग की तरह फैल गयी, और खबर को इतना तोड़ मरोड़ के परोसा गया की करेला और भी कड़वा हो गया, मिर्ची का तीखापन बढ़ गया, और टमाटर सुर्ख लाल हो गया| 

 सब्जी मंडी के दलालो ने सारी सब्जियों को भड़काया और कहा की पोल्ट्री फार्म पर हमला बोल दो, और धीरे से यह खबर पोल्ट्री फार्म के मालिको को भी मिली, उन्होने भी अपने ख़ूँख़ार मुर्गो जिनके नाख़ून बड़े तेज़ थे, को तैयार किया, भड़काया और पिंजरे से आज़ाद किया, फिर जैसे ही सब्जियाँ आई, मुर्गे सब्जियों पर टूट पड़े, मिर्चिया भी मुर्गो की आँखो मे जाके गिरने लगी, करेला, प्याज़ और आलू भी पूरी तरह से मुर्गो को पस्त करने मे लगे हुए थे, टमाटर भी अपने तेवर दिखा रहा था|
 मिर्ची ने अपने तीखेपण से पूरे पोल्ट्री फार्म मे आग लगा दी थी, जिससे बेचारे निर्दोष मुर्गे जल कर भुन गये थे, इधर ख़ूँख़ार मुर्गो ने कितने ही निर्दोष प्याज़, टमाटर और धनिए को कुचल कर चटनी बना दी थी |

और दूसरी तरफ सब्जी मंडी के दलालो और पोल्ट्री फार्म के मालिको ने आपस मे बातचीत करके मामला सुलझा लिया, अंत मे भुने हुई मुर्गो पर कुचली हुई लाल मिर्च, पीसा हुआ टमाटर, कटा हुआ प्याज़ और हरा धनिया डाल कर हमारे देश के "नेताओं" को "धर्मनिरपेक्ष" कबाब खिलाया गया, सभी ने बहुत तारीफ़ की|


एक बार की बात ...जी नही यह ना जाने कितने बार की बात थी..और ना जाने कितने पोल्ट्री फार्म और सब्जी मंडी ऐसे ही जल कर खाक हो गये .. .  और ना जाने कितनी बार फिर ऐसा होगा...मुर्गे और सब्जियाँ कब समझेंगी की इनका आपस मे लड़ना दर-असल "नेताओ" का पेट भरना है|


Sunday, 8 November 2009

Meeting with Life


Disclaimer: This piece of writing “Meeting with life” is an old product of my thoughts  …..I have written it in 2009 and put it on my blog, Please excuse the bad English and grammar.

It was a cold morning of November 2009 but since I am in Hyderabad so this is not that much cold as you imagine it….. :) 
 
that morning I met my life,...yes my life...... her emergence was beautiful, she was looking like my dream girl; long hair, innocent face, black eyes trying to say something with a beautiful smile on fine shaped lips, she was wearing a sapphire color top with black jeans, I was totally awestruck looking at her, somehow I managed to get my wits back and after a formal greet I asked her to sit on a chair opposite to me, it was a restaurant near a lake and in this cold morning no one was there except us, I first started conversation; you are my life ? she said yes, I asked again, how my life can be so innocent and beautiful( though practically it does not seem so) , she replied, I am always beautiful, simple and innocent, but you oversight me always, you didn’t see me in that way, “ohhh, ok, so you are saying that I was not aware of my life”, I said, she said yes, I continued with my hell lot of questions, “but you are so fast that I couldn’t see you carefully, I always saw your flip-side”,  then she replied, “because you were always thinking of what has been done, I mean you wanted to be at a certain place with me forever but I cant stay at one place, I have to keep on moving”, by taking a sip of tea I sustained on my complaints “But you are my life, you have to come along with me, stay with me…..” before I finish my sentence she get into the mood of scolding me and started at a little high pitch.. , “I am along with you always, but you are a bit slow and behind me, that’s why I thought it’s long time when we met each other, when we exchanged words, when you gave me a hug, when you lived me with full of joy, I really don’t remember when you gave me some gift, a gift of achievement, a gift of celebration, a gift of joy, a gift of a loud laughter”…she finished and stopped to take a breath, I was listening her carefully as a child, She was right (a little bit), it was long time, when I saw my life so carefully, when I lived it with full delight…I broke the stillness  “Ok then what we are going to do now?”….. “Nothing, now onwards we will walk together, you will come along with me, you will direct me, you will decide the path for us which we follow and enjoy every moment of togetherness, now onwards you will not look behind just come forward with me” with this note she smiled and she gave her to me and then we started to walk along…we started at a steady pace, that morning walk after a cup of tea was as beautiful as my dream…….
 That was a brief meeting with my life just before my phone rang and it woke me up that morning

Everyone’s life is as gorgeous as your dream girl or your prince charm, but the way we look at it decides how it comes across to you, in this competitive environment when we are running behind success, we all are working hard to achieve our goals, we are overlooking our own life, the pleasure, enjoyment, satisfaction and most important love for others have been flew away because we are not keeping the pace with life, either we are too behind from life or we left behind the life.


So just keep abreast the pace with the life, enjoy every moment of this stunning journey, the roads of this drive with life may not be smooth and should not be because on smooth roads there are chances that we lose our consciousness and fell asleep and we may miss the beautiful spectrum of this journey, so few highs and lows are necessary to be awake on this trip.

 Have a great journey....