Sunday, 2 April 2017

रोमियो ही क्यों

अभी जोर शोर से जो नाम सुनाई दे रहे है वो है एक तो राम और दूसरा रोमियो। एक ही राशि के दो नामो के प्रति अलग अलग भावनाएं है और हमारे देश में आप किसी की भी जान से खिलवाड़ कर सकते हो परंतु ख़बरदार जो किसी की भावनाओ से खिलवाड़ किया तो।

चलिए ज्यादा सेंटी नहीं होते है और मुद्दे पर आते है की आखिर यार एंटी-रोमियो अभियान एकदम से कैसे चल पड़ा और इसका मास्टर माइंड कौन है ? इस अभियान के मोटिव को तो आप सब जानते ही होंगे, किंतु इसके नामकरण के पिछे हाथ है सुब्रमंड्यम स्वामी का जी सही सुना आपने। दर-असल रोम है इटली में और स्वामी जी को इटली वालो से है नफ़रत। बस इतनी सी बात है की स्वामी जी एंटी रोमियो हो गए और योगी जी को नाम सुझा  दिया।




लेकिन रोमियो से नफ़रत करने वाले स्वामी जी को राम जी से बड़ा प्यार है किन्तु इन्ही राम जी का एक बहुत ही प्रसिद्द भजन है जिससे स्वामी जी को बेहद चिढ है और वो भजन है -
                                                               मेरे रोम रोम में बसने वाले राम.  . .
इसीलिए वो कहते है की राम सिर्फ अयोध्या में बसेंगे रोम में नहीं।


चलिए फिर हम भावनाओ में भटक गए बात करते है मुद्दे की, आखिर एंटी रोमियो या एंटी मजनू ही क्यों ? क्यों कोई सरकार एंटी जूलिएट अभियान नहीं चलाती है उस जूलिएट के लिए जो कॉलेज में अपनी अदा दिखा कर दोस्त बना कर लड़को से कैंटीन का बिल भरवाती है, क्यों उस जुलिएट को कोई कुछ नहीं कहता जिसके लिए बेचारा रोमियो अपनी पढ़ाई छोड़कर उसका सारा असाइनमेंट पूरा करे, उसके लिए डेली हर क्लास अटेंड करे और अंत में सिर्फ एक अच्छा दोस्त (धीरे से इसको चु**या पढ़े )बन के रह जाये।


क्यों कोई अभियान नहीं चलता उस जूलिएट के लिए जो दफ्तरों में हलकी से बातचीत और ठिठोली करके अपना सारा कोड बेचारे रोमियों से लिखवा कर अप्रैज़ल सुधार लेती है  और रोमियो एक बार फिर अप्रैज़ल में C Grade लेकर एक बड़ा C बन जाता है। एक अभियान उस जूलिएट के लिए भी चले जो लिफ्ट खराब होने पर अपना १० किलो का राशन का झोला यह कह के शर्मा जी को पकड़ा देती है की अरे शर्मा जी आप तो बड़े फिट है , क्या मेरा बैग पांचवें माले तक ले चलेंगे ? और शर्मा जी छाती फुलाकर जब पाचंवे माले पर झोला देते है तो यही मैडम थैंक यू भैया कहके छाती पंक्चर कर देती है।

अगर आप हमारी बातो से सहमत है तो इस सन्देश को फैला दो ताकि यह सरकार तक पहुँच  जाये। और हाँ चलते चलते एक और बात कहनी थी कि सुना है अवैध कतलखाने भी बंद हो गए है , फिर भी हुस्न बालाएं अपनी  एक मुस्कान से कितने कितने दिलो का क़त्ल किये जा रही है , जरा इस और भी ध्यान दिया जाये।

चलते है , फिर मिलेंगे। राम और रोमियों से बेख़बर होके जरा रम की एक्सपायरी डेट देख लेते है। 



चित्र गूगल जी की मेहरबानी से
 

Thursday, 4 August 2016

दिल्ली की सैर



भारत में लोग-बाग अपने फेवरेट सितारों से मिलने बम्बई जाते है, एक झलक पाने को घंटो हजारो की भीड़ में खड़े रहते है। कुछ बावले लोग तो चुपके से सितारों के घरो में घुस तक जाते है और आराम से घूम-घाम के सकुशल लौट भी आते है। अभी हाल ही में एक भाईसाब ने पुरे ९ घंटे अमिताभ बच्चन के घर में गुजारे वो भी बगैर किसी को भनक लगे।
जब मैंने ये ख़बर पढ़ी तो सोचा की क्यों न मैं भी अपने पसंदीदा मनोरंजक सितारों के दर्शन के लिए उनके घर में घुसपैठ करूँ ? बस यही सोच के मैंने प्लान बनाया दिल्ली सैर का। अजी हाँ मेरा मनोरंजन करने वाले सभी सितारे दिल्ली में ही रहते है।


तो भाईसाब हम पंहुचे दिल्ली और सबसे पहले घुसे अपने नंबर १ मनोरंजक सितारे के बैडरूम में। इस सुपरस्टार को लोग प्यार से पप्पू बुलाते है। ये एक बहुत बड़े खानदान के वारिस है। जैसे ही छुपते -छुपाते इनके घर में दाखिल हुए तो हमने देखा की कमरे के एक कोने में कुछ बुझी हुयी चिलम पड़ी थी, सेंटर टेबल पर कुछ क्रेडिट कार्ड्स और कोई सफ़ेद पाउडर बिखरा पड़ा था टीवी पर फुल वॉल्यूम में डोरीमोन का कार्टून चल रहा था, थोड़ा और नज़र को इधर उधर दौड़ाया तो पाया की ये जनाब अपने पुरे घर में फ़ोन लेकर दौड़ लगा रहे थे। थोड़ा और नज़दीक से जानने की कोशिश की तो हमने पाया की ये तो पोकेमोन-गो नामक मोबाइल गेम खेल रहे थे वो भी घर के अंदर क्योंकि मम्मी ने बाहर जाने से मना किया है। बड़ा अच्छा लगा इन्हें इतना नज़दीक से देखकर। जैसे बाल-गोपाल की कलाएं देखकर गोकुलवासियों का मन मोहित होता होगा बिलकुल वैसे ही हम बाबा को देखकर मोहित होते रहे।

वहाँ से निकल कर फिर हम घुसे ७-रेसकोर्स रोड वाले बंगले में, यकीन मानिये बड़ी आराम से घुस गए यहाँ भी। रात हो चुकी थी और इसी अँधेरे का फायदा उठा कर हम नमो जी के कमरे में घुस गए। ये चमकती सफ़ेद दाढ़ी क्या खूब चांदनी बिखेर रही थी। वो अपनी कुर्सी पर बैठकर कोई किताब बांच रहे थे , शीर्षक थोड़ी देर तक तो नहीं देख पाया अंग्रेजी में था किन्तु थोड़ी मशक्कत के बाद पता चल ही गया उनकी किताब का नाम -Gulliver's Travels था। उनके कमरे की दिवार पर दुनिया का नक्शा टंगा हुआ था और लगभग आधे नक़्शे पर हरे और लाल रंग के पिन घुसे हुए थे। शायद ये पिन इंगित कर रहे थे कि नक़्शे की ये जगहें जहाँ जहाँ पिन लगी थी सारी नमोजी की चरणधूलि पाके धन्य हो चुकी थी। किन्तु लाल और हरे का मतलब क्या हुआ भला? एक लाल पिन हमारे प्रिय पडौसी देश के सीने पर भी घुसी हुयी थी। ओह मतलब समझा हरी पिन मतलब जहाँ आमंत्रण पर पधारे थे और लाल पिन मतलब जहाँ जाके नमोजी ने कहा था "सरप्राईज़ ". . .
बस अब इतनी संवेदनशील जगह पर ज्यादा समय नहीं बिता सकता था तो चुपचाप मैं वहां से कूच कर गया।

अगला और अंतिम पड़ाव था भारत के सबसे ज्यादा चर्चित और चहेते CM का घर। प्यार से इनको भी कईं नाम दिए गए है परंतु इन्हें किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है। पहले धरने-आंदोलनों से और फिर ट्विटर के माध्यम से ये कईं लोगो का मनोरंजन करते आ रहे है। रात हो चुकी थी मैं गलती से इनके बैडरूम में दाखिल हो गया था सो डर और शर्म के मारे इनके बेड के नीचे जाके घुस गया था। तभी भाईसाब और भाभी जी आये मुझे कुछ सूझ नहीं रहा था की यहाँ से कैसे निकलूँ इसलिए चुपचाप वहीं इनके सोने का इंतजार करता रहा। अब आपको पता ही है कि किसी दंपत्ति के बैडरूम चुपके से उनकी बातें सुनना जुर्म है और उन बातो को फिर ज़माने को बताना तो घोर अपराध है। किन्तु लाख कोशिशो के बावज़ूद मैं खुद को रोक नहीं पाया, न सुनने से न ही सुनाने से। तो सुनिये :
मैडम : कितने दिन हो गए आपने रोमांस तो क्या रोमांटिक बातें भी नहीं करी मुझसे। कितने साल हो गए आप मुझे फिल्म दिखाने भी नहीं ले गए हर बार उस मुए मनीष को ले जाते हो। आखिर कब तक चलेगा ऐसा ?
भाई साहब खांसते हुए और मफलर को उतार के साइड में रखते हुए बोले : जानू मैं तुमसे कितना प्यार करता हूँ ये मुझे ट्वीट करके बताने की जरुरत नहीं। मैं तुम्हे डेट पे ले जाना चाहता हूँ, बच्चो को पिकनिक पे ले जाना चाहता हूँ, तुम्हे फिर से पहले जैसा रोमांस करना चाहता हूँ पर क्या करूँ ? मुझे मोदीजी ये सब करने ही नहीं देते।

इतने में मेरी आँख लग गयी और जब खुली तो खुद को अपने कमरे में स्वयं के बिस्तर पर पाया। धत्त तेरे की ये दिल्ली की मनमोहक सैर तो एक स्वप्नदोष निकल गया मेरा मतलब दोषपूर्ण स्वप्न निकल गया।

 नोट: चित्र गूगल इमेज सर्च के सौजन्य से

Thursday, 14 April 2016

बाबा साहेब आंबेडकर

बाबा साहेब आंबेडकर की १२6 वीं  जयंती मनाई जा रही है और बड़े धूमधाम से ही मनाई जा रही है। पिछले कुछ दिनों से चंदा उगाही का कारोबार भी चल रहा है। हमारे देश में कोई भी महोत्सव चाहे वो धार्मिक हो, राजनैतिक हो या सामाजिक हो उसकी तैयारी बड़े जोरो शोरो से होती है। "जोर" लगा लगा के चन्दा उगाया जाता और फिर उस चंदे से हाई वोल्टेज DJ वाले बाबुओं से "शोर" करवाया जाता है। ऐसा अमूमन सभी प्रमुख महोत्सवों के दौरान होता है। (सभी मतलब सभी)

हाँ तो हम बात कर रहे थे बाबासाहेब आंबेडकर की १२6 वीं  जयंती की तो सभी राजनैतिक दल, सामाजिक कार्यकर्ता, और दलितों के, पिछड़ो के मसीहा लोग आज के दिन अपने वातानुकूलित ऐशो -आराम छोड़ के १-२ जगह भाषण देंगे, पिछली, मौजूदा और आने वाली सभी सरकारों को गरियाएंगे और घर जाके २-४ पेग मार के सो जायेंगे। ऐसा ही होता आया है बरसो से।



बरसो से हम सब के मन में राजनैतिक दलों ने बाबासाहेब की एक छवि बना दी है की वो दलित नेता थे। बाबासाहेब का योगदान सिर्फ दलितों के उत्थान के लिए ही सिमित था। हमारी भी स्कूली किताबो ने हमे ज्यादा कुछ नहीं पढ़ाया बाबासाहेब के बारे में सिवाए इसके की वो हमारे संविधान के निर्माता थे।

बाबासाहेब आंबेडकर को इतना "सेलिब्रेट" करने वाले भी उनके कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण योगदानों के बारे में शायद ही जानते होंगे। आइए आपको बताता हूँ की "भारत के आज़ाद होने के बाद" बाबासाहेब का क्या क्या योगदान रहा है देश के लिए। (जो वाक्य बोल्ड और रेखांकित है उसका महत्त्व भी आप समझेंगे लेख के अंत में ).

१. RBI को भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहा जाता है, इसकी परिकल्पना बाबासाहेब ने की थी।

२. भारतीय वित्त आयोग जो की भारतीय राज्यों और केंद्र के बिच वित्त प्रबंधन की प्रमुख कड़ी है का गठन भी बाबासाहेब के प्रयासों से हुआ था।

३. संविधान में "हिन्दू कोड बिल" को कानूनी दर्जा दिलाने की जद्दोजहद भी आंबेडकर ने की थी, इस बिल का मकसद महिला सशक्तिकरण, सती प्रथा और दहेज़ प्रथा का उन्मूलन था। अगर यह बिल पास हो जाता तो १९५१ से ही असल "Women Empowerment" की शुरुआत हो जाती। परन्तु ऐसा हो नहीं पाया और २०१४ में राहुल गांधी को "Women Empowerment" शब्द के रट्टे लगाने पड़े।

४. श्रम मंत्री रहते हुए उन्होंने आधिकारिक कामकाज के घंटो को १२ से घटवा के ८ करवाया। (आईटी वालो को तो अब तक अपने बाबासाहेब का इंतजार है )

५. कश्मीर में आर्टिकल ३७०, जिसके बूते पर कईं सरकारे आई और गयी।  इसी आर्टिकल ३७० को पूरी तरह से नकारने का साहस भी बाबासाहेब ने दिखाया था। उन्होंने कश्मीरियों से कहा था की आप चाहते हो की आपकी सीमा सुरक्षा हम करे, आपको आर्थिक सहायता हम दे , आपको आपदा सहायता हम प्रदान करे और आप हमारे कानून नहीं मानेंगे , ऐसा कैसे हो सकता है ? ( हम मतलब भारत सरकार)
किन्तु आज बाबासाहेब के कईं अनुयायी JNU में आर्टिकल ३७० की वकालत करते है और कश्मीर की आज़ादी का बीड़ा उठाये है।

६. नेशनल पावर ग्रिड, राष्ट्रीय सिंचाई योजना जैसी कईं परियोजनाओं को क्रियान्वित करने में योगदान।
७. बौद्ध धर्म की परिस्थापना और
८. भारत के कईं राष्ट्रिय चिन्हों पर बौद्ध धर्म की छाप भी इन्ही के प्रयासों का परिणाम है।

और भी कईं चीजे मेरी व्यक्तिगत जानकारी के आभाव में छूट गयी है , किन्तु इतनी काफी है इस बात के प्रमाण के लिए की आधुनिक भारत की नींव रखने में उनका अच्छा ख़ासा योगदान रहा है। जिसे राजनैतिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पिछली सरकारों ने प्रचारित नहीं किया।

उनके इन योगदानों को शायद कोई याद भी नहीं करना चाहता, क्योंकि ये पुरे देश के हित में थे। आजकल देश-हित  की बात करने वालो को "सूडो नेशनलिस्ट", "भक्त" या "संघी" कहा जाता है। और अगर बाबासाहेब के इन सभी योगदानों का जिक्र हो गया तो हंगामा खड़ा हो जायेगा। इसीलिए आजतक उन्हें सिर्फ और सिर्फ संविधान निर्माता और दलितों का नेता ही कहा जाता है।

अब चलते चलते आपको उस बोल्ड और रेखांकित वाक्य के बारे में भी कुछ जानकारी दे देते है। उनके उपरोक्त  सभी योगदान भारत के आज़ाद होने के बाद के थे जब उन्हें संवैधानिक ओहदा प्राप्त हुआ था। आज़ादी के पहले की उनकी सारी लड़ाई दलितों के उत्थान के लिए थी। यहाँ अगर कहा जाये कि उनकी लड़ाई अंग्रेजो के खिलाफ डायरेक्ट कभी नहीं रही तो भी असत्य नहीं होगा । उन्होंने अंग्रेजो से भी हाथ मिलाया था ताकि दलितों को अधिकार मिल सके। उन्हें कुछ हद तक कोई सरोकार नहीं था की देश में सरकार किसकी है। उनकी प्राथमिकता में सिर्फ पिछड़ो को आगे लाना था। कुछ एक मुद्दों पर वो गांधीजी के विरूद्ध भी खड़े हुए थे। उन्ही के प्रभाव के चलते आज़ादी के आंदोलन में दलितों का संगठित योगदान उतना अहम नहीं रहा है जितना हो सकता था।

और जहाँ तक रही बात दलितों के लिए काम करने की तो वो जरूर उन्होंने किया किन्तु अकेले उन्होंने किया ऐसा भी नहीं है। जातीप्रथा के खिलाफ अभियान और कईं रूढ़ियों को खत्म करने के लिए प्रमुख कदम उठाने वालो में जो नाम आते है वो राजाराममोहन राय, रबिन्द्र नाथ टैगोर, केशब चन्द्र सेन जैसे लोग है जो की ब्राह्मण थे। इनके अलावा बॉम्बे प्रार्थना समाज, आर्य समाज, सत्य साधक समाज इत्यादि ने भी सर्व कल्याण और मनुष्यो में समभाव  के लिए काम किया। बाबासाहेब ने एक वोटबैंक जरूर खड़ा किया और आज कईं राजनैतिक पार्टियां उसी वोटबैंक के लालच में "दलित-दलित " चिल्लाती फिर रही है।  आज शायद बाबासाहेब अपनी आँखों से यह सब देख रहे होते तो शायद उन्हें थोड़ा दुःख जरूर पहुँचता।

अगर हमारे पुरखो ने जाती प्रथा का प्रचलन शुरू किया और मनुष्यो को उनके कार्य के अनुसार विभाजित किया तो "Social Equality" की बात करने वाले लोगो ने इन्ही मनुष्यो के बिच बैर और घृणा को जन्म दिया। यह सामाजिक विभाजन अब इतना बढ़ चूका है की हम देश हित के बारे में अब भी नहीं सोच रहे है। अब भी हम सिर्फ हमारी जाती, हमारा धर्म, हमारा समाज इन्ही घेरो में अटके है।

हमारा देश तेज़ी से आगे तो बढ़ा है किन्तु ट्रेडमिल के ऊपर। सालो तक  भागने के बाद उतरे तो पाया की हम तो वहीं खड़े है।


नोट: इस लेख का उद्देश्य किसी की भावनाओं को आहात करने का कतई नहीं है। हम बाबासाहेब आंबेडकर के कार्यो के लिए उनका भरपूर सम्मान करते है। किन्तु उनके नाम का दुरुपयोग करने वालो के सख्त विरुद्ध है। जिस प्रकार गांधी जी के नाम का भरपूर दुरूपयोग होता आया है वैसा ही कुछ लोग आंबेडकर के साथ करने जा रहे है।
फिर भी दिमाग की जगह अगर किसी का दिल दुखा हो तो लिखित में क्षमा चाहता हूँ और आशा करता हूँ की इस लेख के विरोध में कहीं आग-जनि, बंद या पत्थरबाजी नहीं होगी। धन्यवाद।

Tuesday, 1 December 2015

असहिष्णुता

दृश्य एक :
स्थान: पुणे
समय-काल  : गणेशोत्सव के आस पास

कहते है की गणेशोत्सव की धूम धाम इस शहर से बढ़कर कहीं  देखने को नहीं मिलती , सच भी है। इस वर्ष भी गणेशोत्सव की तैयारियाँ जोरो शोरो से चल रही है। जोर इस लिए क्योंकि बड़े बड़े ढोल ताशे घंटो उठा के प्रैक्टिस करने में बड़ा जोर लगता है और फिर होने वाला शोर तो वाज़िब है ही । पुणे में गणेश विसर्जन बड़ा खास होता है, भिन्न भिन्न ढोल-ताशा पथक इसके लिए महीनो पहले रियाज़ शुरू करते है और अपनी प्रस्तुति देते है।
इस बार नव-युवा चेतना समूह भी जोर शोर से तैयारी कर रहा है, इस समूह में ६ से  ७० साल तक के सदस्य है। एक ८  साल का बच्चा अपने घर वालो से ज़िद करके अभी अभी इस समूह में दाखिल हुआ है और समूह के सदस्यों ने उसका भव्य स्वागत भी किया।  मात्र ३ दिनों में ही इस बालक ने पुरे समूह का दिल जीत लिया है। अपने अन्य साथियों के साथ वो भी अपने नाजुक कंधो पर भारी ढोल उठा के ताल से ताल मिलाके घंटो प्रैक्टिस करता है।


कईं दिनों की प्रैक्टिस के बाद गणेश विसर्जन के दिन  समूह को अन्य बड़े बड़े ढोल पथको के साथ प्रस्तुति देने का अवसर प्राप्त हुआ । ६ घंटे सतत रूप से ढोल और ताशो के लय ताल से भरे युद्ध में अंततः इस युवा समूह को विजयी घोषित किया जाता है। समूह के सभी बड़े सदस्य छोटे छोटे सदस्यों को अपने कंधे पर उठाकर झूम रहे है। हमारा ८ वर्षीय बालक जो अपने घरवालो से लड़कर इस समूह में शामिल हुआ था वो भी बहुत खुश है। आज उसके माता पिता भी बहुत खुश है यह देख कर की उसे समूह के बाकी लोगो से कितना प्रेम मिल रहा है। J

दृश्य दो:
स्थान: हैदराबाद
समय -काल : रमज़ान का महीना

हैदराबाद की चार मीनार और बिरियानी के अलावा वहां की ओल्ड सिटी में बोली जाने वाली हिंदी भी विश्वप्रसिद्ध है। क्या कहा ? आपने नहीं सुनी वहां की हिंदी ? क्या हौले जैसी बातां करते मियां तुम, तुम हयदेराबाद की हिंदी नको सुने तो क्या सुने जी  ?
चलिए मजाक की बात छोड़िये मुद्दे की बात करते है।
रमज़ान का महीना है, ज्वेलरी की दूकान पर सेठ जी के यहाँ काम करने वालो में ज्यादातर लोग रोज़ा रखते है। जो लोग रोज़ा नहीं रखते वो रोज़ा रखने वालो का ध्यान रखे इस बात का सेठजी पूरा ध्यान रखते है। सेठ जी ने अपने शोरूम के ऊपरी माले में एक कमरा खाली करवाया है। भोजन काल के दौरान रोज़ा न रखने वाले चुपचाप बिना कोई शोर किये उस कमरे में जाके अपना भोजन करके आ जाते है और फिर शाम तक न पानी का और न ही भोजन का कोई जिक्र करते है। शाम होते ही सेठजी अपनी और से इफ्तार के लिए भोजन सामग्री मंगवाकर रोज़ा करने वालो को उसी ऊपरी माले के कमरे में भेजते है जहाँ वो इत्मीनान से अपना रोज़ा खोल सके।


 पुणे वाले किस्से में उस ८ साल के बालक का नाम है  सोहैल  जी हाँ एक मुस्लिम परिवार का बच्चा जो हिन्दुओं के त्यौहार में ढोल बजा रहा था जहाँ  उसे मान सम्मान भी भरपूर मिला।और उसके परिवार ने भी धार्मिक सहनशीलता दिखाते हुए उसे आज़ादी दी अपने मन की करने की।
हैदराबाद की घटना में यह जौहरी सेठ एक हिन्दू है जिन्हे यह भी पता है की इंसानियत भी एक धर्म है। इन्ही सेठ के यहाँ कईं वफादार कारीगर मुस्लिम समुदाय से है और प्रतिवर्ष इनकी दूकान पर ईद और दीवाली समान रुप से मनाई जाती है।

यह किस्से सत्य घटनाओँ से प्रेरित है। ऐसे ही असंख्य किस्से है जो हमारे आस पास बिखरे पड़े है। हम आम लोगो का जीवन बीते कईं वर्षो से इसी प्रकार चल रहा है।किन्तु हमें कभी नहीं लगा की देश में असहनशीलता का वातावरण है। हाँ यह एक राजनैतिक बहस का मुद्दा जरूर हो सकता है किन्तु जरा विचार कीजिये की क्या देश के हीत के लिए ऐसी नकारात्मक बातें फैलाना उचित होगा ? हमें अपने विवेक से भी काम लेना होगा, हम इतने साधन संपन्न भी नहीं है की किसी ने कुछ कहा और देश छोड़ के चले जाएँ।

चलिए अभी इन वास्तविक किस्सों से परे एक काल्पनिक किस्सा सुनाते है।
दृश्य ३
स्थान : आमिर खान का घर,मुंबई
समय-काल : दिसंबर २०१५

३ साल का आज़ाद घर छोड़ने की ज़िद्द लिए बैठा है क्योंकि उसको उसकी माताजी ने डांट दिया है। क्यों ?
क्योंकि अब उसकी शैतानियाँ बर्दाश्त से बाहर है। जब आमिर ने पूछा की बेटा अगर मम्मी ने जरा सा डांट दिया तो इसमें घर छोडनें की क्या जरुरत है ?
मासूम आज़ाद का जवाब सुनिए : "मम्मी को तो किसी ने नहीं डांटा था और वो इंडिया छोड़ने की बात कर रही थी तब तो आपने उन्हें कुछ नहीं कहा और मुझे ज्ञान पेल रहे हो पापा ? हैँ ? "



चित्र: गूगल इमेज सर्च के सौजन्य से









Monday, 5 October 2015

डर लगताहै





कितनी तेज़ है आंधी, न जाने कब यह बूढ़ा पेड़ गिर जाये
मुझे तो धुप में खड़े रहने दो, छाँव से डर लगताहै।

सुना है फिर एक अन्नदाता मर गया भूख से मेरे गांव में
मुझे तो शहर की कोलाहल में ही रहने दो, गांव से डर लगता है।
 
नदियां की बेचैन लहरे, हिचकोले खाती नाव
तैर के पार कर लूंगा , नाव से डर लगताहै।

आज फिर एक निर्दोष मारा गया धरम के नाम पे, शायद चुनाव होने को है कहीं
रहने दो, मत बदलो सरकार को, मुझे अब चुनाव से डर लगता है।

                                                              


Friday, 20 February 2015

विरोध करो

हमारे देश में ३ विशेष प्रकार के लोग आपको ज़रूर मिलेंगे, एक जो आपकी किसी भी बात पर "हाँजी" की मुंडी हिलाएंगे, दूसरे वो जो आपको हर मोड़ पर, हर कदम पर "राय" देते मिलेंगे और तीसरे वो जो आपकी हर बात का "विरोध" करेंगे। ताज़ा सर्वे के आंकड़े बताते है की तीसरे टाइप के याने की विरोधी स्वाभाव के लोग दिन ब दिन बढ़ते ही जा रहे है।

हर जगह हर कोई किसी न किसी बात का विरोध कर रहा है, विधानसभाओ में विपक्षी दल सत्तारूढ़ दल का विरोध कर रहे है, पत्नियां पतियों का विरोध कर रही है, पप्पू अपनी मम्मी का विरोध कर रहा है , मम्मी मोदी का विरोध कर रही है , सेंसर बोर्ड गालियों का विरोध कर रहा है  और हम अपने सारे विरोध गालियां निकाल के कर रहे है।

अभी अभी वेलेंटाईन डे बीता, हर साल की तरह इस साल भी बहुत दिलजलों ने इसका विरोध किया। शादी से पहले हमने भी गर्लफ्रेंड बनाने की कोशिश की तो हमारे घरवालो ने विरोध किया और शादी के बाद कोशिश की तो घरवाली ने विरोध किया तो तैश में आकर हमने भी इस वेलेंटाईन डे का विरोध कर डाला।

खैर अगर इतिहास खंगाले तो विरोध करना भारतियों के स्वाभाव में था ही नहीं, किन्तु जब से गांधी जी ने अवज्ञा आंदोलन का पाठ पढ़ाया और उस पाठ को हमने इतिहास की किताबो में रटा तब से हमे विरोध करने की आदत सी हो गयी है। यह बात और है की हमारा विरोध कहीं नोटिस नहीं होता न ही उस चीज से बच पाते है जिसका विरोध हम करते है।

मसलन स्कूल न जाने का , सुबह जल्दी न उठने का , होमवर्क न करने का , खेलने न जाने देने का , बर्फ का गोला न खाने देने का और कद्दू, करेले, बैगन, मेथी, पालक, मूंग दाल का विरोध तो आपको याद ही होगा जो बचपन में बहुत किया। टाँगे पटक पटक के किया, मूह फाड़ के, दहाड़े मार के और जमीन पर लेट के किया, किन्तु इतना विरोध करने से आखिर मिला क्या ? कुछ नहीं।

इससे तो अच्छा होता की हमारी माँ ने ही बाबूजी का कुछ विरोध किया होता, तो कम से कम हम इस निर्दयी दुनिया में आने से तो बच जाते।  बचपन में कुचले गए हमारे विरोध की खुन्नस हम उम्रभर किसी न किसी तरह का विरोध करके निकालते रहते है।

आज की दुनिया में तो आलम यह है की अगर सारी दुनिया किसी चीज का विरोध कर रही है और आप कुछ नहीं कर या कह रहे तो आप एक नंबर के चु**ये करार दिए जायेंगे। आजकल अपना विरोध दर्ज करवाने के लिए आपको किसी अनशन पर थोड़े ही बैठना है न ही पुलिस के डंडे खाने है। सोशल मिडिया का ज़माना है भई और इस ज़माने में विरोध करना कितना आसान है, जिस किसी ने भी विरोधी स्वाभाव की पोस्ट डाली हो  उसपे जाके बस एक "Like" बटन ही तो दबाना है, या किसी की पोस्ट अच्छी न लगे तो उसको थोड़ा गरिया दो याने गालियां पटक दो बस हो गया विरोध और आप बन गए इंटरनेट के "Intellectual" प्राणी। कुछ ज्यादा तूफ़ानी करना हो तो उस पोस्ट की अपने निहायती घने नेटवर्क(फेसबुक, व्हाट्सप्प, ट्विटर) में आग की तरह फैला दीजिये। और ऐसा करके आपने अपने हिस्से की समाज सेवा कर ली मानो।

अब अगर राजनीती की बात करे तो विपक्ष में बैठी पार्टियों का भी तो एक ही काम है , विरोध करो। कुछ भी हो जाये बस सरकार के कामो का विरोध करो। सरकार ने गरीबो के लिए बैंक खाते खुलवाये, विरोध करो, सरकार ने उद्यमियों की सुविधा के लिए कदम उठाये, विरोध करो, बस किसी न किसी तरह विरोध करो। जब कांग्रेस की सरकार ने परिवार नियोजन लागू किया तब लालू विपक्ष में थे उन्होंने इस योजना का विरोध किया, परिणामस्वरूप दर्जन भर बच्चे पैदा कर डाले।  अभी हमारी कांग्रेस पार्टी ने तो आतंकवादियों के इरादो पर पानी फेरने वाले सुरक्षाकर्मियों का ही विरोध कर दिया। अब तो हालत यह है की विपक्षी पार्टियों के अंदर ही एक दूसरे का विरोध शुरू हो गया है।ताजा हाल यह है की बिहार में एक ही दल के २ मुख्यमंत्री एक दूसरे के विरोध में खड़े है।

परन्तु असल बात तो यही है की जिसका जितना ज्यादा विरोध वो चीज उतनी तेज़ी से फैलती है , उदाहरण देखिये। बचपन में होमवर्क का विरोध किया तो वो बढ़ गया, खेल और टीवी पर पाबन्दी का विरोध किया तो १० और चीजो पर पाबन्दी लग गयी। आज की बात करे तो मोदी जी का १० सालो तक भयानक विरोध किया गया, किन्तु फल क्या निकला ?वो उतनी ही प्रचंडता से सरकार में आये। इधर दिल्ली में मोदी ने केजरीवाल का विरोध करने में पूरी ताकत झोंक डाली, और इस विरोध का परिणाम क्या निकला वो तो आप जानते है। आतंकवाद का विरोध पूरी दुनिया सालो से करती आ रही है, किन्तु क्या हुआ? रुकने की बजाये यह तेज़ी से विश्व के हर देश में फैलता जा रहा है। स्वास्थ्य की बात करे तो हम लोग एबोला और स्वाईन फ्लू का कितना विरोध कर रहे है फिर भी रुकने का नाम ही नहीं ले रहा। और सबसे बड़ा उदहारण फिल्म PK, कितना विरोध हुआ इस फिल्म का, किन्तु सबसे ज्यादा कमाई भी इसी फिल्म ने की।

इतने सरे उदाहरणों से कुछ समझे आप ? मतलब ये है की जिस चीज का जितना तगड़ा विरोध करो वो उतनी ही तेज़ी से फैलती है, सीधे सीधे न्यूटन महाराज का तीसरा नियम लागू हो रहा है।

तो अब ध्यान रखे, जब भी पेट्रोल के दाम घटे तब आप विरोध करे, जब भी अर्थव्यवस्था सुधार की बात हो आप विरोध करे, जब भी सेंसेक्स ऊपर चढ़ता दिखे तुरंत उसका विरोध शुरू करे, सफाई अभियान का विरोध करे, स्वाईन फ्लू और अन्य बीमारी से बचने के लिए जो निर्देश दिए है उनका विरोध करे, यहाँ तक की अगर कोई सरकारी कर्मचारी रिश्वत न ले तो उसका भी विरोध करे, फिर देखिये कैसे हमारा देश तरक्की करता है।

मैंने तो सरकार को चिट्ठी लिख के अपना यह प्रस्ताव भी भेजा है की सरकार अपने ख़ुफ़िया सोशल नेटवर्किंग डिपार्टमेंट को ही यह काम सौंप दे, विरोध करने का, बाकी हम "लाइक और शेयर" के बटन तो दबा ही देंगे।

तो कुल मिलाकर मन की शांति और देश की तरक्की के लिए विरोध करते रहिये। हम पैदा ही विरोध करने और सहने के लिए हुए है।




Monday, 2 February 2015

टीवी का अत्याचार

आजकल चुनावो का मौसम चल रहा है और पार्टियां अपने अपने वादे-दावे ले ले कर जनता के पास जा रही है। परन्तु ८० प्रतिशत जनता को न फ्री wifi चाहिए, न फ्री पानी-बिजली चाहिए और न ही सस्ता पेट्रोल, उनकी तो एक ही मांग है की कैसे भी करके टीवी चैनल्स पर होने वाले भारी अत्याचार से मुक्ति दिलवा दो। अब यह और बात है की किसी भी पार्टी के नेता ने ऐसी किसी भी मांग को अब तक स्वीकार नहीं किया है। कैसे करे, आखिर नेता भी तो टीवी पर आ आ कर मासूम जनता पर अत्याचार ही कर रहे है।

एक समय था जब मर्द बीवी के अत्याचार से त्रस्त रहता था, परन्तु अब वही मर्द टीवी के अत्याचार से त्रस्त नज़र आता है। आपके घर में अगर एक भी महिला है तो आप ने यह दर्द कभी न कभी तो महसूस किया ही होगा जब आपको मन मार कर, खाना खाते समय,  टीवी पर बालिका-वधु जबरन देखना पड़ा होगा।

सीरियल किलर्स का ज़माना गया और किलर सीरियल्स का ज़माना है भाई लोगो।



अभी अभी तो लोगो ने ओबामा तक से विनती कर डाली की भैया हमारे देश की दूसरी समस्याएं तो जब ख़त्म होगी तब होगी, तुम आतंकवाद, पर्यावरण से निपटते रहना, पहले ससुराल सिमर का से निजात दिलाओ। 
आपकी भावनाओ का तो पता नहीं, परन्तु मुझे कभी कभी जेठालाल पर भी दया आती है जब उसकी "दया" को देखता हूँ, और तो और बेचारी बबिता, मासूम भोली बबीता, उसको तो कोई जेठालाल से बचा लो। तारक मेहता खुद जिनकी लेखनी इन सब की जिम्मेदार है वो भी अब मूह छुपाते घूमते होंगे अपने इलाके में। 

"साथ निभाना साथिया" और "यह रिश्ता क्या कहलाता है" जैसे धारावाहिको में दिखाए जाने वाले बेहद अमीर परिवार भी हमेशा समस्याओं से ग्रसित रहते  है। एक मुसीबत से निकलते ही दूसरी तैयार रहती है, बेचारो का कोई त्यौहार, कोई रस्म, कोई पूजा-पाठ ठीक से नहीं हो पाता, हर घडी कोई न कोई अड़चन आती ही रहती है। अगर हमें इनके अत्याचारों से नहीं बचा सकते तो इन बेचारे परिवारो को कोई तो मुक्ति दिलाओ इन दिनोदिन की बढ़ती मुसीबतो से। 

उधर बिग बॉस में "सलमान के वार " से बचे तो "फरहा खान" के अत्याचार से रूबरू हो गए, कोई तो पार्टी होगी इस चुनाव में जो बिग बॉस पर रोक लगाएगी। एक पार्टी ने तो दिल्ली में लाखो सी. सी.टी. वी कैमरे लगवाने का वादा किया है, मतलब पूरा दिल्ली अब बिग बॉस का घर होगी। समझ नहीं आ रहा ख़ुशी की खबर है या दुःख की। 

आज हमारे देश के युवाओ को ड्रग्स से जितना खतरा नहीं होगा उससे कहीं ज्यादा एम टीवी रोडीज़ से है, जो लगातार ८ वर्षो से एक से एक बेहतरीन चु*** (बीप बीप बीप ) खोज खोज कर दर्शको को परोस रहे है।  

अगर आपको लगता है की आपके दिमाग में ज्ञान का ओवरफ्लो हो चूका है तो आप उपरोक्त उल्लेखित धारावाहिको में से कोई भी एक देख लीजिये। इनसे बेहतर बुद्धिविनाशक और ज्ञान हारक चीज कुछ नहीं है। आप फिर से एक दम तरोताजा होकर ज्ञान की तलाश में निकल जायेंगे। 

 सुनने में तो यहाँ तक आया है की नरक लोक में पापियों को दी जाने वाली यातनाओं में फेर-बदल कर दिया गया है।  अब उन्हें गरम तेल की कढ़ाई में नहीं तला जायेगा, बलकि पाप के हिसाब से प्रतिदिन बिना विश्राम के उन्हें टीवी में यह सारे धारावाहिक एक के बाद एक दिखाए जायेंगे। इस बात से तो साबित हो गया है की आदमी को अपने पापो की सजा इसी जीवन में किसी न किसी चैनल पर भुगतनी पड़ेगी। 

और जब तक यह लेख पूरा होता उससे पहले ही एक खुश खबरी आयी है की अन्ना का अगला आंदोलन अब भ्रष्टाचार के खिलाफ नहीं, टीवी के अत्याचार के खिलाफ होगा। तो भाईयों इसी बात से हम आशा कर सकते है की इस आंदोलन के बाद भी एक और पार्टी बनेगी और उम्मीदों के मुताबिक हमारे लिए टीवी रोकपाल बिल लेकर आएगी। 

तब तक के लिए कोशिश करो की नया चैनल "एपिक" देखने को मिल जाये जो की फिलहाल सारे चुतियापे का एन्टीडोट है । 

नोट : लेख में प्रयोग की गयी मामूली अभद्र भाषा के लिए क्षमा, और अगर दी गयी गाली की तीव्रता कम लगे तो खुद से बढ़ा लीजिये। 



Thursday, 4 December 2014

एक बंधुआ मज़दूर की कहानी

 क्या आप भगवान या भाग्य में यकीन रखते है ?

आप कहोगे की आज यह कौनसी बेतुकी बात कर रहे हो , खुद की मेहनत और हुनर के सिवा किसी पे यकीन करना बईमानी है। पढ़े लिखे नवजवान जो ठहरे आप, ऐसा ही सोचना होगा आपका, है ना ? अब भइया हम आपको एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी सुना रहे है,  मतलब पढ़वा रहे है।  इसको पढ़कर आपको यकीन हो जायेगा की गरीब, ईमानदार और मेहनती लोगो को उनका ईश्वर उन्हें न्याय जरूर दिलाता है।

यह घटना मध्यप्रदेश  के एक छोटे से गाँव की है, गाँव मे अधिकांश लोग किसान है और सब के सब बड़े किसान है और उँची जाती से है तो ज़ाहिर सी बात है की खेतो में काम करने के लिए मज़दूर मिलना बहुत मुश्किल होता होगा किसानो के लिए। इसीलिए मज़दूरी के लिए बाहर से लोगो को लाया जाता है और अपने खेत पर रख कर साल भर काम करवाया जाता है।

ऐसे ही एक बड़े किसान परिवार जिसका मुखिया है रामप्रसाद ने मध्यप्रदेश के नीमाड क्षेत्र से एक मजदूर परिवार जिसका मुखिया है मोहनलाल  को अपने यहाँ लगभग बंधुआ मजदूर की हैसियत से रखा हुआ था। नाम मात्र का वेतन और खूब सारा काम करवाया जाता था उनसे. मोहन का परिवार भी इसी बात से खुश था की कम से कम २ वक़्त की रोटी तो मिल रही है पूरे परिवार को नही तो अपने क्षेत्र मे ना तो बारिश है ना ज़मीन ही इतनी उपजाऊ की कुछ काम मिल सकता।



गाँव हो या शहर, किसान हो या उद्योगपति, कॉम्पीटिशन के इस समय मे हर कोई अपने प्रतिद्वंदी को निचा करने का मौका ढूंढता है।  इसी गाँव के दूसरे किसान परिवार ने जिलाधीश कार्यालय में रामप्रसाद की शिकायत लगा दी।  शिकायत पर जिला कलेक्टर ने मोहन के  परिवार को बंधुआ मजदूर घोषित कर गाँव से रिहा कर के उनको वापस अपने गाँव भिजवा दिया।

अभी यहाँ पर सवाल यह है की सरकारी कायदो के मुताबिक कलेक्टर ने सही किया या मानवीय आधार पर गलत किया ?खैर जो भी हो , अभी एक परिवार बेरोज़गार हो गया था और दूसरी तरफ एक बड़े किसान की फसल पर विपरीत असर होने आया था।  सरकारी कायदो के मुताबिक बाहर के व्यक्ति को "जबरदस्ती" अपने खेत पर कम वेतन पर रखना और काम करवाना "बंधुआ मज़दूरी" की श्रेणी में आता है।

किसान परिवार के मुखिया रामप्रसाद ने पुनः उस मोहन के  परिवार को अपने  गांव में बुला लिया और इस बार उसको गांव का स्थाई निवासी बना लिया, याने की  उसके राशन कार्ड, वोटिंग कार्ड इत्यादि उसी गांव के बनवा दिए।  अब मोहन इसी गांव का निवासी हो गया और दिहाड़ी मज़दूरी पर रामप्रसाद के यहाँ काम करने लगा। 

६ महीने बाद गांव के पंचायत के चुनाव के समय इस गांव की सीट अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवार के लिए आरक्षित घोषित की गयी। और इस बार गांव को बगैर चुनाव के ही सरपंच मिल गया।  पुरे गांव में केवल एक ही परिवार था जो अनुसूचित जनजाति का था और जिसके पास गांव के स्थाई निवासी होने के वैध कागज़ भी थे।
जी हाँ दोस्तों, वो था मोहन का परिवार। और हाँ अब मोहन को उस गांव में मज़दूर नहीं मोहन सरपंच के नाम से जाना जाता है।

तो अब बताईये की यहाँ भाग्य ने अपना खेल खेला की नहीं ??



Monday, 2 June 2014

एक रेल यात्रा और २ स्मरणीय नाम

एक रेल यात्रा और २ स्मरणीय नाम

बात १९९० की गर्मियों की है, में और मेरी मित्र भारतीय रेलवे सेवा के प्रशिक्षु के तौर पर लखनऊ से देल्ही तक का सफर कर रहे थे।  हमारी ही बोगी में २ सांसद भी सवार थे जिनसे हमे कोई परेशानी नहीं थी, परन्तु उनके साथ यात्रा कर रहे उनके १०-१२ साथियो ने बड़ी ही बदतमीज़ी से हमसे बात की। उन लोगो ने हमारी आरक्षित सीट से ही हमें उठा कर खुद सवार हो गए ,  और तो और भद्दी भद्दी टिप्पणियाँ भी करते रहे। उस बोगी में कोई भी यात्री या टिकट चेकर हमारी सहायता करने आगे नहीं आया। हम लोगो ने भय युक्त वातावरण में जैसे तैसे रात गुजारी। 

अगले दिन सुबह हम डेल्ही पहुंचे, तथापि उन गुंडों ने हमें कोई शारीरिक क्षति तो नहीं पहुचाई परन्तु मानसिक रूप से हमें बहुत आघात पंहुचा था।  मेरी मित्र को तो इतना गहरा सदमा पंहुचा था की उन्होंने प्रशिक्षण का अगला चरण टालना ही उचित समझा जो की अहमदाबाद में होना था।

मेने अहमदाबाद जाने का निर्णय किया क्योंकि एक और प्रशिक्षु मेरे साथ यात्रा करने वाली थी। इस बार हम आरक्षण नहीं करवा पाये और वेटिंग का टिकट लेकर ट्रैन में चढ़ गए।  प्रथम श्रेणी के कोच में TTE  से हमने बात की और समझाया की हमारा अहमदाबाद पहुचना कितना जरूरी है, वो हमें एक द्विशायीका (कंपार्टमेंट ) में लेके गया और बैठ कर कुछ देर इन्तेजार करने को कहा। मेने अपने संभावित सह-यात्रियों की और देखा जो की अपने परिधानों से किसी राजनैतिक पार्टी के नेता ही लग रहे थे। मुझे अपनी पिछली यात्रा का संस्मरण हो आया और मेरी भाव-भंगिमा से मेरे भीतर की घबराहट मेरे मुख पर स्पष्ट दिखाई पड़ रही थी। TTE ने मेरे चहरे के भाव पढ़कर मुझे आश्वस्त किया की ये लोग सभ्य और  नियमित यात्री है। 

उनमे से एक कुछ ४० पार रहा होगा और दूसरे की उम्र कुछ ३५-४० रही होगी। उन लोगो ने ख़ुशी ख़ुशी हमारे लिए बैठने की जगह बनाते हुए खुद को एक कोने में समेट लिया। उन दोनों ने अपना परिचय गुजरात के भाजपा नेताओ के रूप में दिया, उन्होंने अपने नाम भी बताये मगर नाम हम याद नहीं रख पाये, हमने भी उन्हें बताया की हम आसाम से रेलवे सेवा के प्रशिक्षु है। हम लोगो ने कई विषयों पर बातचीत की, विशेषकर इतिहास पर। मेरी मित्र ने इतिहास में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर रखी  थी सो उसने बढ़चढ़ कर चर्चा में हिस्सा लिया, मेने भी बीच बीच में भाग लिया। नेताओ में से जो वरिष्ठ थे उन्होंने ने उत्साह के साथ चर्चा में अपनी हिस्सेदारी दिखाई जबकि दूसरे नेता ने सुनने में अधिक रूचि दिखाई। 

बातो के बीच में मेने श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु का जिक्र किया की कैसे उनकी मौत आज तक एक रहस्य बनी  हुयी है।  कनिष्ठ नेता जो की अब तक बगैर ज्यादा कुछ कहे सिर्फ सुन रहे थे, अचानक बोले : "आप श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में कैसे जानती है ?", तब मेने उन्हें बताया की किस प्रकार से उन्होंने मेरे पिताजी की पढ़ाई के लिए छात्रवृत्ति का इन्तेजाम किया था। 

अचानक से वरिष्ठ नेता ने हमसे कहा , "आप लोग गुजरात में हमारी पार्टी क्यों नहीं ज्वाइन कर लेते ?" हमने जोर का ठहाका लगा के कहा की हमारे बस का ना है और वैसे भी हम गुजरात के नहीं है , तभी छोटे नेता ने कहा : " तो क्या फरक पड़ता है अगर आप आसाम से हो, हमारे यहाँ प्रतिभावान लोगो का स्वागत है ", यह  कहते वक़्त उनके शांत गंभीर चेहरे पर एक चमक सी साफ़ नज़र आ रही थी। हमे प्रतीत हुआ की ये सिर्फ कहने की बात नहीं थी , बल्कि वो लोग गंभीर थे। 

खाना आ चूका था, ४ शाकाहारी थालियां।  हम चारो ने शांतिपूर्वक भोजन किया और जब पेन्ट्री वाला पैसे लेने आया तो छोटे वाले नेताजी ने पूरा भुगतान स्वयं किया।  मेने धीरे से धन्यवाद दिया, उन्होंने सीधे तौर पर दरकिनार करते हुए कहा की इतनी छोटी बात के लिए कैसा धन्यवाद।  उस समय उनके आभामंडल पर जो चमक थी वो देखने लायक थी।

 इतने में TTE  ने आकर हमें सीट की अनुपलब्धता के बारे में जानकारी देकर अपनी असमर्थता ज़ाहिर की और कहा की कुछ और इन्तेजाम नहीं हो सका।  इतना सुनते ही वो दोनों नेतागण तपाक से बोल पड़े की चिंता करने की कोई बात नहीं है हम व्यवस्था कर देंगे। उन्होंने बड़े आराम से निचे फ्लोर पर चादर बिछाई और सो गए और हमने उन लोगो की सीट पर कब्ज़ा जमा लिया। 

पिछली ट्रैन यात्रा और इस यात्रा में कितना बड़ा अंतर था, एक तरफ उन राजनेताओ का झुण्ड जो सभी सह-यात्रियों से बदतमीज़ी कर रहे थे और एक तरफ यह २ नेता जिनके साथ हमे पूर्ण सुरक्षा का अनुभव हो रहा था। अगली सुबह जब ट्रैन अहमदाबाद के करीब पहुंची तो वरिष्ठ नेता ने हमसे हमारे रहने के प्रबंध के बारे में पूछा और अपना पता बताते हुए कहा की कुछ भी समस्या हो तो हम बेझिझक उनके घर जा सकते है, छोटे वाले नेता ने कहा की मेरा तो अहमदाबाद में कोई ठौर ठिकाना नहीं है , परन्तु आप लोग इनका निमंत्रण स्वीकार कर सकते हो और कोई भी परेशानी हो तो बता सकते हो, हम हर संभव सहायता की कोशिश करेंगे। 

 यह सब बातें करते वक़्त उन दोनों के मुख पर एक गंभीरता और आशावान चमक थी। हमने अपने रहने के प्रबंध के बारे में उन्हें आश्वस्त किया और निमंत्रण के लिए उन्हें सहृदय धन्यवाद दिया।  

इससे पहले की ट्रैन  स्टेशन पर रूकती और हम लोग उतर कर अपने अपने गंतव्य की और प्रस्थान करते मेने अपने बैग से अपनी डायरी और पेन निकलते हुए उन दोनों से अपने अपने नाम लिखने का आग्रह किया। क्योंकि में उन दो विशाल ह्रदय वाले नेताओ का नाम नहीं भूलना चाहती थी जिन्होंने नेताओ के प्रति मेरे पूर्वाग्रह को एक अलग ही दिशा प्रदान की थी। 

उन्होंने डायरी लेकर एक -एक करके अपना नाम लिखा , उम्र में बड़े दिखने वाले नेता ने लिखा शंकर सिंह वाघेला और छोटे नेता ने लिखा नरेंद्र मोदी। 

यह पूरा घटनाक्रम मेने १९९५ में एक असमीज़ समाचार पत्र में लिखा था, यह उन दो गुजरती नेताओ के प्रति मेरी आदरांजलि थी जिन्होंने निस्वार्थ भाव से हम दो असमिया बेन  के लिए इतना कुछ किया था।  By Leena Sarma
(The author is General Manager of the Centre for Railway Information System, Indian Railways, New Delhi. leenasarma@rediffmail.com)

नोट: प्रस्तुत लेख अंग्रेजी समाचार पात्र "द  हिन्दू " में १ जून २०१४ को प्रकाशित हुआ था , उसी का हिंदी अनुवाद मेने यहाँ प्रस्तुत किया 

 अंग्रेजी में पढ़ने के लिए निचे दिए लिंक पर जाये :